जालौन , जून 28 -- उत्तर प्रदेश में जालौन जिले की कालपी तहसील स्थित गुरु का इटौरा गांव धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां स्थित रोपण गुरु मंदिर तथा प्राचीन गुरु तड़ाग आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के केंद्र बने हुए हैं।

वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. हरिमोहन पुरवार के अनुसार यह स्थल देवगुरु बृहस्पति की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। डॉ. पुरवार ने बताया कि कालपी से दक्षिण तथा उरई से उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग 2286 एकड़ क्षेत्र में फैला गुरु का इटौरा अपनी पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक विरासत के कारण विशेष पहचान रखता है। गांव का नाम ही इस बात का संकेत देता है कि यह देवताओं के गुरु बृहस्पति की तपस्थली रही है।

उन्होंने बताया कि ब्रह्माण्ड पुराण में इस क्षेत्र का उल्लेख एक ऐसे महापुण्य स्थल के रूप में मिलता है, जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला माना गया है। पुराणों के अनुसार देवगुरु बृहस्पति ने यहां दीर्घकाल तक कठोर तपस्या की थी। यहां स्थित पवित्र तड़ाग में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने तथा पुण्य की प्राप्ति होने की मान्यता आज भी प्रचलित है।

डॉ. पुरवार के अनुसार शास्त्रों में देवगुरु बृहस्पति को महर्षि अंगिरस का पुत्र तथा देवताओं का गुरु बताया गया है। इसी कारण यह स्थान 'गुरु का इटौरा' कहलाया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह क्षेत्र ज्ञान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना की पवित्र भूमि रहा है।

उन्होंने बताया कि इस गांव को अकबरपुर इटौरा के नाम से भी जाना जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार ढौंडिया खेरे के राजवंश में जन्मे रोपण गुरु की कर्मस्थली यही स्थान थी। उनकी ख्याति से प्रभावित होकर मुगल सम्राट अकबर ने यहां एक गांव बसवाया, जिसके बाद यह क्षेत्र अकबरपुर इटौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वर्तमान में रोपण गुरु मंदिर स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था स्थल है।

इतिहासकार के अनुसार गुरु का इटौरा का इतिहास वैदिक काल तक पहुंचता है। वैदिक एवं पौराणिक युग से लेकर बौद्ध काल तक यहां की धार्मिक परंपराएं निरंतर जीवित रहीं। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुए धार्मिक परिवर्तनों के बावजूद इस क्षेत्र की आस्था और धार्मिक गतिविधियां प्रभावित नहीं हुईं तथा यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान होते रहे।

डॉ. पुरवार ने बताया कि सिकंदर के भारत आक्रमण के समय भी यह क्षेत्र उसके प्रभाव से अछूता रहा। इसके बाद यौधेय, गुप्त, हूण तथा विभिन्न स्थानीय शासकों के शासनकाल में भी इसकी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रही। यवन, कुषाण और शक जैसी विदेशी जातियों के आगमन के बावजूद गुरु का इटौरा अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखने में सफल रहा।

उन्होंने बताया कि छठी से तेरहवीं शताब्दी तक चंदेल शासकों के संरक्षण में यहां धार्मिक गतिविधियों को विशेष बढ़ावा मिला। इसके बाद गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, सैय्यद और लोदी शासनकाल में भी यह क्षेत्र सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से सक्रिय बना रहा। राजनीतिक परिवर्तन होते रहे, लेकिन गुरु का इटौरा अपनी आध्यात्मिक पहचान और धार्मिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रहा।

डॉ. हरिमोहन पुरवार का कहना है कि गुरु का इटौरा केवल एक गांव नहीं, बल्कि जालौन जनपद की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर है। उनका मानना है कि यदि रोपण गुरु मंदिर, गुरु तड़ाग तथा यहां की पौराणिक विरासत का समुचित संरक्षण कर पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकता है।

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