भुवनेश्वर , जुलाई 17 -- ओडिशा के देबरीगढ़ अभयारण्य में वन्यजीवों की सुरक्षा के मद्देनजर एक व्यापक योजना की शुरुआत करते हुए सघन गश्त, अवैध शिकार रोकने के लिए निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया उपायों को लागू किया गया है।
योजना के तहत एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी किया गया है, जिसमें जुलाई से अक्टूबर तक वन्यजीवों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से कड़ी निगरानी की जायेगी।
यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि मानसून के शुरू होते ही 353 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अभयारण्य में अवैध शिकार, लकड़ी की तस्करी और इंसानों के घुसने का खतरा बढ़ जाता है। गौरतलब है कि यह अभयारण्य ओडिशा के सबसे महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में से एक है और यहां गौर, तेंदुआ, स्लोथ बियर, सांभर, चित्तीदार हिरण और चार सींग वाले मृग बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। यहां लुप्तप्राय भारतीय ढोल (जंगली कुत्ते) के सफल प्रजनन का भी रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
एक बड़ी चुनौती अभयारण्य की हीराकुंड जलाशय के साथ लगती लगभग 100 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसका फायदा उठाकर शिकारी और लकड़ी तस्कर नावों का इस्तेमाल कर सकते हैं। मानसून के दौरान अभयारण्य के छह झरने पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं, जिससे यहां आने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इससे अनधिकृत प्रवेश, अवैध पिकनिक और वन्यजीवों को परेशान किए जाने का खतरा भी बढ़ जाता है। भारी बारिश के कारण निचले इलाकों में पानी भर जाता है और जानवर गांवों की ओर चले आते हैं, जिससे वन्यजीव प्रबंधन और भी मुश्किल हो जाता है।
वन्यजीव प्रभाग ने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से 941 किलोमीटर के दायरे में 129 पैदल गश्त वाले मार्ग तय किए हैं। सभी 26 बीट कार्यालयों के बीट अधिकारियों को जोखिम के आकलन, खुफिया जानकारी और पिछली घटनाओं के आधार पर रोजाना गश्त की योजना तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
हीराकुंड वन्यजीव प्रभाग की प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) अंशु प्रज्ञान दास ने बताया कि चौबीसों घंटे निगरानी के लिए 28 गश्ती टीमें तैनात की गयी हैं। इनमें से 11 टीमें अभयारण्य के अंदर और 17 टीमें इसकी सीमा पर काम करेंगी।
उन्होंने बताया कि एसओपी में उन संवेदनशील इलाकों की पहचान की गयी है जहां कड़ी निगरानी की जरूरत है। इनमें 21 प्रवेश बिंदु, जलाशय के किनारे का 100 किलोमीटर का हिस्सा, 115 किलोमीटर लंबी वन सड़कें, गांवों की 96 किलोमीटर लंबी सीमाएं, गांवों के 31 पगडंडी रास्ते, छह झरने और जलाशय तक जाने के छह रास्ते शामिल हैं। सुरक्षा योजना के तहत अभयारण्य की 71 इको-विकास समितियों (इडीसी) को भी शामिल किया गया है, ताकि वे गांवों की ओर वन्यजीवों की आवाजाही की जानकारी देते हुए अवैध गतिविधियों के बारे में खुफिया जानकारी साझा कर सकें। वन अधिकारियों को इन सामुदायिक समूहों के साथ मिलकर काम करने का निर्देश दिया गया है।
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