गुरुग्राम , जुलाई 17 -- न्यूरोसाइंटिस्ट एवं इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोसाइंसेज के कार्यकारी सदस्य डॉ. नरेश पुरोहित ने शुक्रवार को कहा कि दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में ब्रेन स्ट्रोक का शिकार होता है, जबकि लगभग 80 प्रतिशत ब्रेन स्ट्रोक समय रहते सावधानी बरतकर रोके जा सकते हैं।
डॉ पुरोहित ने गुरुग्राम स्थित एसजीटी मेडिकल कॉलेज की ओर से आयोजित "बैटल अगेंस्ट ब्रेन स्ट्रोक" विषयक सेमिनार में यह जानकारी दी।
सेमिनार के बाद पत्रकारों से बातचीत में एसोसिएशन ऑफ स्टडीज इन न्यूरोसाइंसेज के प्रधान अन्वेषक (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर) डॉ. पुरोहित ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक दुनिया में मृत्यु और स्थायी विकलांगता के प्रमुख कारणों में शामिल है। भारत में भी यह मृत्यु और दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। देश में ग्रामीण क्षेत्रों में स्ट्रोक की व्यापकता लगभग 262 प्रति एक लाख आबादी, जबकि शहरी क्षेत्रों में 424 प्रति एक लाख आबादी है।
डॉ. पुरोहित ने बताया कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में स्ट्रोक का खतरा लगभग दोगुना है। हरियाणा में स्ट्रोक के लगभग हर सात मरीजों में से एक की उम्र 30 से 50 वर्ष के बीच है, जो चिंता का विषय है। ब्रेन स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या रक्त वाहिका फटने से मस्तिष्क में रक्तस्राव होने लगता है। इसके प्रमुख कारणों में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, शराब का सेवन, मोटापा, हृदय रोग तथा आनुवंशिक कारण शामिल हैं।
डॉ. पुरोहित ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के चेहरे का एक हिस्सा अचानक टेढ़ा पड़ जाए, हाथ या पैर में कमजोरी आ जाए, बोलने में कठिनाई हो, संतुलन बिगड़ जाए, उल्टी हो या अचानक बेहोशी आ जाए, तो इसे ब्रेन स्ट्रोक का संकेत मानते हुए बिना समय गंवाए तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि कई बार 'साइलेंट स्ट्रोक' भी होते हैं, जिनमें छोटे-छोटे रक्त के थक्के धीरे-धीरे मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। इससे याददाश्त कमजोर होना, सोचने-समझने की क्षमता घटना, अस्पष्ट बोलना, बार-बार सिरदर्द, शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या चलने में परेशानी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। नियमित ब्रेन स्कैन के जरिए ऐसे साइलेंट स्ट्रोक का समय रहते पता लगाया जा सकता है।
डॉ. पुरोहित ने कहा कि स्ट्रोक के इलाज में समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। स्ट्रोक आने के बाद शुरुआती चार घंटे 'गोल्डन विंडो' माने जाते हैं। इस दौरान यदि मरीज को समय पर विशेषज्ञ अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो क्लॉट-बस्टिंग दवाओं या मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी आधुनिक प्रक्रियाओं से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बहाल कर स्थायी नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। यदि यह समय निकल जाता है तो मरीज को स्थायी विकलांगता या गंभीर मस्तिष्क क्षति का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि कई मरीज समय बर्बाद करते हुए छोटे अस्पतालों या ट्रॉमा सेंटरों में चले जाते हैं, जहां उन्नत न्यूरोलॉजी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। ब्रेन स्ट्रोक के प्रभावी उपचार के लिए न्यूरोलॉजिस्ट, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ और पुनर्वास (रीहैबिलिटेशन) टीम की संयुक्त भूमिका आवश्यक होती है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी कि 40 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोग, तथा 30 वर्ष की आयु के बाद धूम्रपान या शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति नियमित रूप से अपना रक्तचाप और रक्त शर्करा की जांच कराते रहें। इसके अलावा कैरोटिड डॉप्लर स्कैन जैसी आधुनिक जांचों से रक्त वाहिकाओं में कोलेस्ट्रॉल के जमाव का समय रहते पता लगाया जा सकता है, जिससे बड़े स्ट्रोक की संभावना को कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने लोगों से स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, नियमित व्यायाम करने, संतुलित आहार लेने, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाए रखने तथा नियमित स्वास्थ्य जांच कराने की अपील करते हुए कहा कि यदि ब्रेन स्ट्रोक का संदेह हो तो हर मिनट कीमती होता है। समय पर अस्पताल पहुंचकर उचित जांच और उपचार से न केवल मरीज की जान बचायी जा सकती है, बल्कि उसे स्थायी दिव्यांगता से भी बचाया जा सकता है।
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