नयी दिल्ली , मई 19 -- ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवाला संहिता (आईबीसी) के तहत दिसंबर 2025 तक 'कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया' (सीआईआरपी) संबंधी 8,800 से अधिक मामले दाखिल हुए हैं तथा इसके तहत स्वीकृत दिवाला समाधान योजनाओं के योजनाओं के जरिए लेनदारों को 4.11 लाख करोड़ रुपये से अधिक की डूबी राशि प्राप्त हो चुकी है। यह जानकारी आईबीसी पर यहां मंगलवार को आयोजित एक कार्यशाला में दी गयी।
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग द्वारा 'दिवाला और दिवालियापन (संशोधन) अधिनियम, 2026' पर आयोजित कार्यशाला में बताया गया कि आईबीसी के जरिए कर्ज में डूबी 4,000 से अधिक कंपनियों को समाधान, निपटान, वापसी या अपील-संबंधी समापन प्रक्रियाओं के जरिए उबारा गया है।
वित्तीय सेवा विभाग के सचिव एम. नागराजू ने कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए समय बद्ध और लेनदार-संचालित दिवाला समाधान व्यवस्था कायम करने में आईबीसी की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस कानून से ऋण चुकाने की संस्कृति मजबूत हुई है और इसमें ऋण के बोझ में दबी सम्पत्तियों के परिसमापन के बजाय संकटग्रस्त इकाईयों के कारोबार के पुनरुद्धार करने और उनका मूल्य सुधारने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
श्री नागराजू ने पूरे कंपनी समूह के दिवालापन, सीमा-पार के दिवाला के मामलों और लेनदार-द्वारा-शुरू की गई दिवाला समाधान प्रक्रिया से संबंधित हालिया संशोधनों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये सुधार दिवाला ढांचे को और अधिक मज़बूत करेंगे तथा समाधान में होने वाली देरी को दूर करेंगे।
भारतीय दिवाला और दिवालियापन बोर्ड (आईबीबीआई) के अध्यक्ष रवि मित्तल ने संस्थागत क्षमता को मजबूत करने, लेनदारों का विश्वास बढ़ाने और दिवाला समाधान प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को बढ़ावा देने में आईबीसी की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हालिया संशोधन हितधारकों के बीच समन्वय को बेहतर बनाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि दिवाला समाधान ढांचा कुशल, निष्पक्ष और भविष्य के लिए तैयार बना रहे।
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