नयी दिल्ली , अप्रैल 04 -- राष्ट्रीय राजधानी के कमानी ऑडिटोरियम में शनिवार को युवा गायक भाग्येश मराठे ने जब सुरों की तान छेड़ी, तो दर्शक दर्शक अचंभित रह गये और सुध-बुध खोकर भारतीय शास्त्रीय संगीत के सागर में डुबकी लगाने लगे।
पंडित केदार बोडस के शिष्य एवं पंडित राम मराठे की गायकी परंपरा से जुड़े भाग्येश मराठे ने अपनी शानदार प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी गायकी में रागों की साफ समझ, शास्त्रीय संगीत गहराई और भावनाओं की सरल अभिव्यक्ति देखने को मिली।
इसके बाद कर्नाटक संगीत की प्रसिद्ध कलाकार और 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2024' से सम्मानित डॉ. जयंती कुमारेश ने सरस्वती वीणा वादन प्रस्तुत किया। उनके वादन में अभ्यास, तकनीकी कुशलता और मधुर सुरों का सुंदर मेल था। गौरतलब है कि इसी वर्ष डॉ. जयंती कुमारेश को 'संगीता कलानिधि पुरस्कार 2026' के लिए भी नामांकित किया गया है, जिसे कर्नाटक संगीत का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है।
दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में आज दो दिवसीय 'भीलवाड़ा सुर संगम 2026' का आगाज हुआ। भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को समर्पित भीलवाड़ा सुर संगम 2026' का यह 13वां संस्करण है। एलएनजे भीलवाड़ा समूह द्वारा आयोजित इस समारोह के पहले ही दिन शास्त्रीय संगीत प्रेमियों, कलाकारों और संस्कृति के रसिकों का अनोखा संगम देखने को मिला। कार्यक्रम की शुरुआत हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन से हुई।
इस मौके पर भाग्येश मराठे ने कहा कि संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, बल्कि एक परंपरा है, जिसे पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ निभाना होता है। उनके अनुसार, 'रियाज़' केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है, जो कलाकार को अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।
वहीं, डॉ. जयंती कुमारेश ने कहा कि वीणा केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ध्वनि का स्वरूप है। उन्होंने बताया कि संगीत में वह शक्ति है, जो मन को शांति प्रदान करते हुए भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच एक सेतु का काम करती है।
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