नयी दिल्ली , फरवरी 16 -- दिल्ली की एक अदालत ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोपी एक व्यक्ति को बरी कर दिया है, क्योंकि उसे किसी संगठित अपराध गिरोह का सदस्य स्थापित करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत नहीं थे।
अदालत के आदेश में कहा कि आरोपी तलविंदर उर्फ जारा को मकोका की धारा 3 और 4 के तहत दंडनीय अपराधों से मुक्त किया जाता है। अदालत ने कहा, "हालांकि, आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 174-ए (पार्ट-I) के तहत दंडनीय अपराध के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है, जिसके लिए उसके खिलाफ आरोप तय किए जाने योग्य हैं। श्री जारा को निर्देश दिया जाता है कि वह एक सप्ताह के भीतर समान राशि के एक मुचलके के साथ 50,000 रुपये का जमानत बांड भरे।"अदालत ने पाया कि उसके खिलाफ केवल एक आपराधिक मामले का हवाला दिया गया था, जिसमें वह पहले ही बरी हो चुका था। यह भी पाया गया कि मकोका के तहत दर्ज इकबालिया बयानों में जबरन वसूली या गैरकानूनी गतिविधि की विशिष्ट घटनाएं नहीं थी, केवल सामान्य दावे थे।
अदालत ने कहा, "बयानों में स्पष्ट रूप से जबरन वसूली की किसी विशिष्ट घटना या किसी अन्य गैरकानूनी गतिविधि का कोई संदर्भ नहीं है।" अदालत ने यह भी कहा कि 2013 के बाद आरोपी की किसी भी आपराधिक संलिप्तता को इंगित करने वाली कोई सामग्री नहीं थी।
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