चेन्नई , जुलाई 11 -- अपनी सुरीली आवाज से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली और 'द नाइटइंगेल ऑफ साउथ इंडिया' के नाम से मशहूर दिग्गज पार्श्व गायिका एस जानकी का शनिवार रात कर्नाटक के मैसूरु में उम्र संबंधी बीमारियों के कारण निधन हो गया।
वह 88 वर्ष की थीं। इस महान पार्श्व गायिका ने विभिन्न भाषाओं में लगभग 48,000 गाने गाये थे।
अत्यंत मधुर, सहज और संगीतमय आवाज की धनी श्रीमती जानकी ने वर्ष 2013 में पद्म भूषण पुरस्कार लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह सम्मान उनके करियर में काफी देर से मिला है।
छह दशकों से अधिक लंबे करियर में 'जानकी अम्मा' के नाम से लोकप्रिय गायिका ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी सहित 20 से अधिक भाषाओं में फिल्मों, एलबम, टेलीविजन और रेडियो के लिए 48,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किये।
अपनी असाधारण बहुमुखी प्रतिभा, भावपूर्ण गायकी और बेजोड़ आवाज के उतार-चढ़ाव के लिए प्रसिद्ध श्रीमती जानकी ने 'क्वीन ऑफ एक्सप्रेशन' का खिताब हासिल किया था।
श्रीमती जानकी ने 1957 में अपने तमिल फिल्मी सफर की शुरुआत की, लेकिन 1962 की फिल्म 'कोंजुम सलंगई' के गाने "सिंगार वेलने देवा" ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया। संगीतकार एमएस विश्वनाथन के मार्गदर्शन में उन्होंने 1960 और 1970 के दशक की शुरुआत में लगातार कई हिट गाने दिये।
वर्ष 1971 की फिल्म 'अवलुकेंड्रू ओर मनम' के उनके गाने "उन्निदथिल एन्नई कोडुथेन" ने उन्हें तमिल सिनेमा के शीर्ष गायकों में मजबूती से स्थापित कर दिया।
दशकों के दौरान उन्होंने एमएस विश्वनाथन, इलैयाराजा और एआर रहमान सहित महान संगीतकारों के साथ काम किया। उन्होंने एक अन्य दिग्गज गायक एसपी बालासुब्रमण्यम के साथ भी कई यादगार युगल गीत दिये। वह इन तीनों दिग्गज संगीतकारों के निर्देशन में राज्य पुरस्कार जीतने वाली एकमात्र गायिका हैं।
उनकी विशाल संगीतमय सूची में कई कालजयी तमिल एकल गीत शामिल हैं, जैसे "सिंगार वेलने देवा", "ओहो एंधन बेबी", "अदिचिरुक्कु नल्लाथोरु चांसु", "इंधा मंदरथिल ओडी वरुम", "कन्नन मनानिलायई", "पका लिल पेसुम निलाविनई कंडेन्", "पंधल इरुनधाल", "उन्निदथिल एन्नई कोडुथेन" और "कोंडुवा इनुम कोंजम"। अपने जीवन के उत्तरार्ध में भी उन्होंने 2014 की फिल्म 'वेलाईइल्ला पट्टाधारी' के "अम्मा अम्मा" जैसे गानों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करना जारी रखा। विभिन्न भाषाओं में उनकी आवाज ने "सेंथूरा पूवे", "इंजी इदुपाजहागा", "थेंड्रल वंधु", "निला कायुम" और "अदुक्कु मल्ली" जैसे अनगिनत यादगार गानों के जरिए पीढ़ियों को प्रभावित किया।
तेईस अप्रैल 1938 को आंध्र प्रदेश में जन्मीं जानकी ने 1957 में 19 साल की उम्र में तमिल फिल्म 'विधियिन विलायाट्टू' से अपने पार्श्व गायन करियर की शुरुआत की थी। सालों-साल वह भारतीय सिनेमा की सबसे पसंदीदा आवाजों में से एक बनी रहीं और कई पीढ़ियों के अभिनेताओं के लिए अपनी आवाज दी।
संगीत में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'कलैमामणि' और 'राज्योत्सव प्रशस्ति' जैसे सम्मानों के अलावा चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 राज्य फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था। वर्ष 2013 में श्रीमती जानकी ने भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि यह मान्यता बहुत देर से मिली है। उनका मानना था कि भारतीय संगीत में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 'भारत रत्न' देने पर विचार होना चाहिए था।
श्रीमती जानकी ने 2016 में पार्श्व गायन से संन्यास की घोषणा की थी, जिससे उनके शानदार करियर पर विराम लगा, जिसने पीढ़ियों तक भारतीय सिनेमा की सांगीतिक दुनिया को गढ़ा। उनके कालजयी गीत भाषा और समय की सीमाओं से परे आज भी श्रोताओं के दिलों में गूंजते हैं। उनके निधन से भारतीय संगीत ने अपनी सबसे प्रतिष्ठित और अपूरणीय आवाजों में से एक को खो दिया है।
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