भुवनेश्वर , अक्टूबर 22 -- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री चिंता मोहन ने गुरुवार को घोषणा की कि दलितों के मंदिर प्रवेश के शताब्दी वर्ष को मनाने के लिए गत 13 अक्टूबर से शुरू हुए कार्यक्रमों की श्रृंखला देश भर में पूरे एक साल तक आयोजित की जायेगी।
श्री मोहन ने यहां ओडिशा प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि इन कार्यक्रमों के जरिए छुआछूत के खिलाफ हुए ऐतिहासिक संघर्ष और पूजा-स्थलों में समान अधिकारों के लिए लड़ी गयी लड़ाई को प्रदर्शित किया जायेगा। ये कार्यक्रम 13 अक्टूबर 2027 तक चलेंगे तथा इनका समापन आंध्र प्रदेश के तिरुपति में एक बड़ी जनसभा के साथ होगा। इन प्रस्तावित कार्यक्रमों का उद्देश्य भारत के समाज सुधार आंदोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय और समानता तथा सम्मान के लिए जारी संघर्ष की ओर फिर से ध्यान आकर्षित करना है।
उन्होंने कहा कि देशभर के प्रमुख शहरों और तीर्थस्थलों पर बैठकें, सेमिनार, चर्चाएं और जनसभाएं आयोजित की जायेंगी। इनमें दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, वाराणसी, अयोध्या, बेंगलुरु, चेन्नई, केरल और श्रीशैलम शामिल हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए चलाये गये ऐतिहासिक अभियान को प्रदर्शित किया जाएगा। इसके साथ ही इस संदेश को भी मजबूत किया जायेगा कि समानता, सामाजिक न्याय और जाति-आधारित भेदभाव से मुक्ति एक लोकतांत्रिक समाज के अनिवार्य स्तंभ हैं।
श्री मोहन ने मंदिर प्रवेश आंदोलन की शुरुआत के बारे में बात करते हुए कहा कि छुआछूत के खिलाफ जनमत तैयार करने में महात्मा गांधी और कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने लगभग एक सदी पहले तिरुपति के पास तिरुचनूर मंदिर में मुरुगन नाम के एक दलित व्यक्ति से जुड़ी घटना को याद किया। उन्होंने बताया कि पंचम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मुरुगन ने मंदिर में प्रवेश किया और कपूर से आरती की। इसके बाद पुलिस ने मुरुगन के खिलाफ धारा 295 के तहत मामला दर्ज किया और उन्हें तिरुपति जेल भेज दिया।
उन्होंने बताया कि बाद में सी. राजगोपालाचारी तिरुपति आये और अदालत में मुरुगन का पक्ष रखा, जिससे उन्हें सजा से बचने में मदद मिली। उन्होंने महात्मा गांधी को भेजे गए एक चार पन्नों के पत्र का भी जिक्र किया, जिसमें इस घटना, पुलिस की कार्रवाई और उस समय प्रचलित छुआछूत की प्रथा का विस्तार से वर्णन था। कांग्रेस नेता ने कहा कि यह घटना उस दौर में दलितों के सामने आने वाली सामाजिक बाधाओं को दर्शाती है। साथ ही यह उस आंदोलन के महत्व को भी रेखांकित करती है, जिसका उद्देश्य बिना किसी भेदभाव के दलितों को पूजा-स्थलों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाना था।
श्री मोहन ने दावा किया कि इसके बाद महात्मा गांधी ने तिरुपति में एक सत्याग्रह का नेतृत्व किया और 13 अक्टूबर 1925 को 33 दलितों का एक मंदिर में प्रवेश सुनिश्चित कराया। उन्होंने कहा कि भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में इस घटना को और अधिक पहचान मिलनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष में मुरुगन के योगदान को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस शताब्दी समारोह को मनाने से हमें उन लोगों के बलिदानों और प्रयासों को याद करने का मौका मिलेगा, जिन्होंने गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक कुरीतियों को चुनौती दी और एक अधिक समावेशी समाज बनाने की दिशा में काम किया। उन्होंने शताब्दी वर्ष की योजनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि इन आयोजनों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, कानूनी विशेषज्ञ, बुद्धिजीवी और सामाजिक न्याय एवं समानता के लिए प्रतिबद्ध अन्य लोग एक साथ आयेंगे। इन कार्यक्रमों में दलितों के मंदिर प्रवेश के ऐतिहासिक महत्व, छुआछूत के खिलाफ लड़ाई और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों एवं सम्मान को बनाये रखने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया जायेगा।
उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2027 में तिरुपति में एक बड़े स्तर पर समापन बैठक आयोजित की जायेगी। उन्होंने यह भी कहा कि अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और अल्पसंख्यक समुदायों को अभी तक पूरी तरह से राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता नहीं मिल पाई है। उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पर दलितों के अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया और वंचित समुदायों के हितों की रक्षा तथा सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए नये सिरे से प्रयास करने का आह्वान किया।
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