, Sept. 13 -- धर्मशाला, 13 सितंबर (UNI) तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ प्रचारक और हिमालय परिवार के संरक्षक इंद्रेश कुमार तथा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएचपी) के कुलपति प्रो. एस.पी. बंसल से मुलाकात की। इस दौरान सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक एकता, तिब्बत, हिमालय संरक्षण, भारत-तिब्बत संबंध और विश्व शांति सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
बैठक के दौरान श्री कुमार ने भारत की उस सभ्यतागत सोच को रेखांकित किया, जिसमें विविधता में एकता, सभी धर्मों के प्रति सम्मान, संवाद, सह-अस्तित्व, करुणा और मानव कल्याण को महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में ये मूल्य वैश्विक शांति और मानवता के लिए बेहद प्रासंगिक हैं।
सामाजिक सद्भाव पर जोर देते हुए श्री कुमार ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हो सकती। इसके लिए आपसी सम्मान पर आधारित समानता वाला, आत्मनिर्भर, संवेदनशील और संगठित समाज जरूरी है। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक वर्ग को समान सम्मान, अवसर और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी मिलनी चाहिए।
प्रो. बंसल ने दलाई लामा को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय पहलों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सीयूएचपी जल्द ही शांति पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करेगा, जिसमें विभिन्न देशों के प्रतिभागी और प्रतिनिधि शामिल होंगे। सम्मेलन में विश्व शांति, मानवीय मूल्य, सह-अस्तित्व, संवाद, सांस्कृतिक समझ और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।
उन्होंने दलाई लामा को बताया कि उनके मार्गदर्शन के बाद विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म और तिब्बती संस्कृति से संबंधित अध्ययन शुरू किए गए हैं। प्रो. बंसल ने कहा कि बौद्ध दर्शन, तिब्बती संस्कृति और हिमालयी विरासत का अकादमिक अध्ययन हिमाचल प्रदेश में स्थित विश्वविद्यालय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
उन्होंने दलाई लामा को श्री अशोक कुमार बेरी और डॉ. हिमांशु अग्रवाल द्वारा लिखित पुस्तक "समरस समाज-विकसित भारत का आधार" भेंट की। पुस्तक में सामाजिक सद्भाव, समानता, भाईचारा, सामाजिक एकता और राष्ट्र निर्माण की भारतीय अवधारणा पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
श्री कुमार और हिमालय परिवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष परमजीत सिंह गिल ने दलाई लामा को सिंधु कुंभ और सिंधु दर्शन से जुड़ी गतिविधियों की भी जानकारी दी और उन्हें 22 से 27 जून तक लद्दाख में सिंधु नदी के किनारे आयोजित होने वाले सिंधु महोत्सव में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। दलाई लामा ने इसके जवाब में अपना आशीर्वाद दिया।
श्री कुमार ने कहा कि सिंधु से जुड़े कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को सिंधु नदी से जुड़ी भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना से जोड़ना तथा विभिन्न देशों और संस्कृतियों के बीच संवाद और मित्रता को बढ़ावा देना है। कार्यक्रम में करीब 10 से 15 देशों के प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है।
उन्होंने दलाई लामा को हिमालय परिवार और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की ओर से हिमालय संरक्षण, सामाजिक जागरूकता, राष्ट्रीय एकता तथा भारत-तिब्बत के सांस्कृतिक संबंधों सहित विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों की भी जानकारी दी।
दलाई लामा ने भारत, यहां के लोगों और देश की आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत ऐसी भूमि है, जहां सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है और विभिन्न संस्कृतियां साथ-साथ रहती हैं।
उन्होंने कहा कि भारत ने कई वर्षों से उन्हें गर्मजोशी और सम्मान का वातावरण उपलब्ध कराया है। उन्होंने कहा कि देश की करुणा, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की परंपराओं ने उन्हें बौद्ध परंपरा और साधना को सहजता से जारी रखने में सक्षम बनाया है।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत की विकास यात्रा में समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी जरूरी है तथा सामाजिक सद्भाव, समान अवसर, भाईचारा और आपसी सम्मान एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए मूलभूत आधार हैं।
बैठक का समापन "वसुधैव कुटुम्बकम" यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भावना, सभी धर्मों के प्रति सम्मान, सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक एकता, करुणा, सह-अस्तित्व और विश्व शांति के आदर्शों को मजबूत करने पर साझा जोर के साथ हुआ। साथ ही भारत और तिब्बत के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संबंधों तथा शांति और सद्भाव के साझा संदेश को आगे बढ़ाने पर भी बल दिया गया।
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