अगरतला , जून 03 -- त्रिपुरा ने 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' (पीएमएमएसवाई) के अंतर्गत मत्स्य उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है लेकिन उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करने के लिए राज्य को अभी भी दूसरे राज्यों से मछली आयात करना पड़ता है।

राज्य के मत्स्य मंत्री सुधांशु दास ने कहा है कि यह क्षेत्र राज्य के ग्रामीण विकास के सबसे आशाजनक क्षेत्रों में से एक बनकर उभरा है जो हजारों मछली किसानों को रोजगार के अवसर प्रदान कर रहा है और उनकी आजीविका को बेहतर बना रहा है, जिसकी पुष्टि त्रिपुरा की नवीनतम 'आर्थिक समीक्षा' से भी हुई है।

वर्ष 2024-25 के दौरान, मत्स्य विभाग ने पीएमएमएसवाई के अंतर्गत 8,139.77 लाख रुपये से अधिक का निवेश किया जिससे विभिन्न मत्स्य विकास परियोजनाओं के माध्यम से 18,912 व्यक्तियों को लाभ पहुंचा। मत्स्य पालन की प्रमुख योजना के अंतर्गत लगभग 19,000 लोगों को सहायता मिली है जिसके परिणामस्वरूप मीठे पानी में हैचरी की स्थापना, मछली तालाबों का निर्माण, एकीकृत मत्स्य पालन को बढ़ावा, केज कल्चर का विस्तार और बायोफ्लॉक मछली पालन तथा सजावटी मछली पालन जैसी नवीन तकनीकों को अपनाया गया है।

इन पहलों ने राज्य में मछली उत्पादन बढ़ाने और मत्स्य पालन पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत करने में बहुत योगदान दिया है। मत्स्य पालन विभाग के अनुसार मुख्य उपलब्धियों में डंबूर जलाशय में 24.54 लाख से ज़्यादा मत्स्य बीज (फिंगरलिंग्स) डालना और 1,464 केज कल्चर इकाई को सहायता देना शामिल है।

इन उत्साहजनक आंकड़ों के बावजूद, त्रिपुरा के मछली बाजारों में पड़ोसी राज्यों आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम तथा बंगलादेश से बड़ी मात्रा में मछली का आयात जारी है। व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं का कहना है कि स्थानीय बाज़ारों में पूरे वर्ष आयातित मछलियों का ही वर्चस्व रहता है।

कृषि अर्थशास्त्री और मत्स्य अनुसंधानकर्ता मानते हैं कि मछली उत्पादन के आंकड़ों का मूल्यांकन वास्तविक बाज़ार आपूर्ति, उपभोग के तरीकों और सरकारी योजनाओं के अंतर्गत निर्मित मत्स्य संपत्तियों की वहनीयता के साथ करना चाहिए।

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