नयी दिल्ली , अगस्त 19 -- भारत में रह रहे तिब्बती समुदाय के लोग गुरुवार को देश भर में गुरूवार (20 अगस्त) को विरोध प्रदर्शन करेंगे। यह विरोध प्रदर्शन तिब्बत में लगातार हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर दुनिया का ध्यान खींचने और चीन के उस नए कानून का विरोध करने के मकसद से किया जा है, जिसकी वजह से उनकी विशिष्ट भाषाई, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है।

यह विरोध प्रदर्शन यहां के अलावा कोलकाता, धर्मशाला, चेन्नई और बेंगलुरु सहित देश के कई प्रमुख शहरों और केंद्रों पर आयोजित किया जायेगा।

नॉर्थ-ईस्ट के लिए 'तिब्बती यूथ कांग्रेस' के समन्वयक त्सेपेल तेनज़िंग ने 'यूनीवार्ता' को बताया, "कोलकाता में चीनी दूतावास के बाहर कैंडललाइट मार्च निकालकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।"प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस वर्ष एक जुलाई से लागू चीन का नया कानून तिब्बती, मंगोल और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भाषा व संस्कृति को समाप्त करने की साजिश है। उनका कहना है कि यह कानून जबरन आत्मसात की नीति को कानूनी मान्यता देता है और दुनिया में कहीं भी इन समुदायों द्वारा किए जाने वाले विरोध को दंडनीय बनाता है। यह कानून 'नृजातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देना' के नाम से लाया गया है।

श्री तेनज़िंग के अनुसार, इस देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत दो जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर तिब्बती कार्यकर्ता एवं पूर्व भिक्षु लोबगा रंगज़ेन (उर्फ लोबसांग पाल्डेन) द्वारा किए गए आत्मदाह की घटना के बाद हुई। श्री रंगज़ेन ने हाथ में तिब्बती ध्वज लेकर खुद को आग लगा ली थी, जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। तिब्बती संगठनों का कहना है कि उन्होंने तिब्बत की स्वतंत्रता और वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिए यह चरम कदम उठाया था। इस घटना के बाद से दुनिया भर के तिब्बती कार्यकर्ता एकजुट हो रहे हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों तथा कैंडललाइट मार्च के जरिए अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत में इस समय लगभग एक लाख तिब्बती शरणार्थी निवास कर रहे हैं। ये उन शरणार्थियों के वंशज हैं जो 1959 में हिमालयी क्षेत्र में चीनी सैन्य कार्रवाई के बाद दलाई लामा के साथ भारत आ गए थे।

श्री तेनज़िंग ने बताया, "चीन हमें एक ऐसे अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है जिसे आसानी से मिटाया जा सके। लेकिन हकीकत यह है कि हम तिब्बत में बहुसंख्यक हैं और तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र है। हम इसी सत्य पर जोर देना चाहते हैं।"उन्होंने आरोप लगाया, "चीन सरकार हमारे बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूलों में भेज रही है, जहां केवल मंदारिन भाषा सिखाई जाती है और तिब्बती भाषा पर पूरी तरह पाबंदी है। यह हमारी पहचान और संस्कृति को जड़ से मिटाने का प्रयास है।" उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन का एक अन्य उद्देश्य उन तिब्बतियों की ओर दुनिया का ध्यान खींचना भी है, जो चीनी नीतियों का विरोध करने के कारण रहस्यमय तरीके से गायब हो गए या उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

उन्होंने बताया, "हाल के वर्षों में हजारों तिब्बतियों ने विरोध जताने का साहस दिखाया और वे अचानक गायब कर दिए गए।" श्री तेनज़िंग ने तिब्बती गायक ए-सांग (त्सुकटे) का उदाहरण देते हुए कहा कि 'प्रिंस ऑफ पीस' नामक गाना गाने के बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया। इस गाने को दलाई लामा के प्रति श्रद्धांजलि माना गया था, जिन्हें चीन "अलगाववादी" करार देता है। गाना गाए जाने के बाद से ही उनका कोई सुराग नहीं है।

उन्होंने कहा, "तिब्बत में भिक्षु लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन कड़े सेंसरशिप और मीडिया पर प्रतिबंधों के कारण ये घटनाएं दुनिया के सामने नहीं आ पातीं।" विभिन्न स्वतंत्र रिपोर्टों से भी यह पुष्टि होती है कि तिब्बत में मीडिया पर सख्त पाबंदियाँ हैं और विदेशी पत्रकारों की पहुंच वहाँ बेहद सीमित है।

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