चेन्नई , जुलाई 20 -- तमिलनाडु में त्रिची ज़िले के कोट्टापालयम गांव में कैथोलिकों के लिए बने सार्वजनिक कब्रिस्तान में दलित कैथोलिक को दफ़नाने की जगह पाने के लिए दो दशक से ज़्यादा समय तक संघर्ष करना पड़ा और आखिरकार सोमवार को वहां स्थान मिल सका।

सेवानिवृत शिक्षक ए. राजू का शव तीन दिनों तक दफ़नाए जाने का इंतज़ार करता रहा; उन्हें सार्वजनिक कब्रिस्तान में दफ़नाया जाना था लेकिन दबदबे वाली रेड्डी जाति के लोगों ने उस जगह पर अपना एकाधिकार जमा रखा था और वहां कड़ा पहरा बिठा रखा था। मृतक के घर से मुख्य सड़क पर स्थित विशाल कब्रिस्तान की दूरी मात्र 300 मीटर थी। अब तक वहां किसी भी दलित ईसाई को दफ़नाया नहीं गया था और चर्च के अधिकारियों ने इस विषय पर मौन धारण कर लिया था और इस समस्या के समाधान के लिए कोई कदम नहीं उठाया, जिसके कारण दलितों को न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ा।

साल 2014 में जिला मुंसिफ़ अदालत में एक मुक़दमा दायर किया गया और अगस्त 2024 में दलितों के पक्ष में फ़ैसला आया। अदालत के आदेश में यह साफ़ किया गया कि कब्रिस्तान सभी कैथोलिक ईसाइयों के लिए है इसलिए दलित कैथोलिकों का भी वहां अधिकार है और किसी को भी इसमें किसी भी तरह की रुकावट नहीं डालनी चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में कुंभकोणम डायोसीज़ के बिशप और कोट्टापालयम पैरिश के पादरी इस मामले में प्रतिवादी थे। अधिवक्ता और जीवित बचे याचिकाकर्ताओं में से एक धास प्रकाश ने कहा, "वर्तमान पादरी फादर माइकल राज सहित लगातार नियुक्त किए गए पैरिश पादरियों ने न्यायालय के आदेश को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया। कि चूंकि मृतक इस मामले में याचिकाकर्ता थे इसलिए दलितों ने निर्णय लिया कि उनके शव को साझा कब्रिस्तान में ही दफनाया जाना चाहिए।"उन्होंने कहा कि हमने कलेक्टर और अन्य अधिकारियों के सामने धरना दिया और उन्हें याचिकाएं भी सौंपीं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

सेंट मैरी मैग्डलीन पैरिश चर्च एक सदी पुराना है और इसके कामकाज में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था। दलित बुजुर्गों ने बताया कि इस साल ही सालाना रथ उत्सव के लिए दलितों से चंदा स्वीकार किया गया।

शनिवार सुबह से ही पैरिश पादरी के साथ बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। रविवार को दलित समुदाय के लोग पैरिश पादरी से मिले। पुलिस ने भी मामले में दखल दिया। चूंकि सोमवार शाम को सेंट मैग्डलीन मारिया का पैरिश कार उत्सव शुरू होने वाला है इसलिए इसे अगले हफ़्ते तक टालने की पूरी कोशिश की गई लेकिन चर्च में लोगों की भीड़ जमा होती रही।

मुसिरी के आरडीओ, एसएस कुंटिया, जिन्होंने शुरू में बुधवार तक का समय मांगा था, दोनों पक्षों और पैरिश पादरी को आगे की बातचीत के लिए शाम पांच बजे मुसिरी स्थित अपने दफ्तर बुलाया। दलित प्रतिनिधियों ने बातचीत में शामिल होने के लिए समन की मांग की। समन मिलने पर वे बातचीत में शामिल हुए। रात करीब 21.30 बजे, साझा कब्रिस्तान में ही शव को दफ़नाने का फ़ैसला किया गया लेकिन एक शर्त के साथ कि यह सिर्फ़ मृतक के लिए ही होगा। हालांकि, दलितों को अच्छी तरह पता था कि यह अदालत के आदेश के अनुसार नहीं है फिर भी उन्होंने इसे मान लिया क्योंकि यह एक आंशिक जीत थी और मृतक को दफ़नाना ज़रूरी था।

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