चेन्नई , जुलाई 29 -- द्रमुक अध्यक्ष एवं तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 151 सुपर-विशेषज्ञता मेडिकल सीटों के नुकसान पर राज्य सरकार की तीखी आलोचना करते हुए बुधवार को इसे राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली और भविष्य की चिकित्सा क्षमता के लिए बड़ा झटका करार दिया।

श्री स्टालिन ने मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार पर हमला बोलते हुए 'एक्स' पर याद दिलाया कि छह वर्ष पहले आज ही के दिन द्रमुक ने कड़ा संघर्ष कर अखिल भारतीय मेडिकल प्रवेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण हासिल किया था, जबकि मौजूदा सरकार अपनी ही सीटें गंवा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के मौन रहने और उसकी ओर से नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ताओं के न्यायालय में उपस्थित न होने से तमिलनाडु को अपनी 151 सीटें गंवानी पड़ीं। उन्होंने सरकार पर मामले की शुरुआत से ही लापरवाही बरतने और मजबूत कानूनी पक्ष होने के बावजूद 'आत्मसमर्पण' करने का आरोप लगाया।

यह मामला दरअसल अखिल भारतीय कोटे में तमिलनाडु की सुपर-स्पेशियलिटी सीटों को स्थानांतरित करने से जुड़ा है, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने 29 मई 2026 को फैसला सुनाया था। श्री स्टालिन ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में तमिलनाडु के हितों का प्रभावी ढंग से बचाव करने में पूरी तरह विफल रही। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता न्यायालय में उपस्थित ही नहीं हुए और न ही उन्होंने कोई मजबूत तर्क रखा। श्री स्टालिन का कहना है कि मजबूत कानूनी स्थिति होने के बावजूद टीवीके सरकार के इस 'मौन आत्मसमर्पण' और शुरुआती लापरवाही के कारण ही राज्य को इतनी बड़ी संख्या में अपनी मेडिकल सीटों से हाथ धोना पड़ा।

इससे प्रभावित सरकारी डॉक्टरों की आशंकाओं और सवालों का हवाला देते हुए श्री स्टालिन ने इसे राज्य के लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु ने ऐसे 151 सुपर-स्पेशलिस्ट सरकारी डॉक्टरों को खो दिया है, जो भविष्य में राज्य के लोगों की सेवा करने वाले थे। उन्होंने मांग की कि टीवीके सरकार को इस लापरवाही पर सरकारी डॉक्टरों और राज्य की जनता को उचित स्पष्टीकरण देना चाहिए।

उन्होंने कहा, "छह वर्ष पहले आज ही के दिन द्रमुक ने पूरे भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण हासिल करने के लिए कड़ा संघर्ष किया था। लेकिन आज यह खबर आयी है कि तमिलनाडु को अपनी सुपर-स्पेशियलिटी मेडिकल सीटें गंवानी पड़ेंगी।"उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार उच्चतम न्यायालय में तमिलनाडु के हितों का प्रभावी ढंग से बचाव करने में विफल रही। उन्होंने दावा किया कि मामले के महत्व के बावजूद सरकार की ओर से नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता पेश नहीं हुए और न ही उन्होंने मजबूत तर्क रखे। उन्होंने वरिष्ठ कानूनी वकील नियुक्त करने में हुई देरी पर भी सवाल उठाये और मामले से निपटने के तरीके को 'शुरू से ही लापरवाही भरा' करार दिया।

कई तीखे सवाल उठाते हुए श्री स्टालिन ने यह भी पूछा कि क्या मजबूत कानूनी स्थिति होने के बावजूद राज्य सरकार ने 'आत्मसमर्पण' कर दिया था? उन्होंने राज्य की काउंसलिंग प्रक्रिया के समय पर भी सवाल उठाया और जानना चाहा कि क्या यह जल्दबाजी में की गयी थी और ऑल इंडिया काउंसलिंग का दूसरा दौर होने से पहले ही 151 सीटों को खाली घोषित कर दिया गया था, जो कि एक जानबूझकर उठाया गया कदम हो सकता है।

द्रमुक के आग्रह के बावजूद तमिलनाडु की सुपर-स्पेशियलिटी सीटों को ऑल इंडिया कोटे में स्थानांतरित करने के विरोध में पिछले विधानसभा सत्र के दौरान विशेष प्रस्ताव पारित न करने के लिए भी द्रमुक नेता ने सरकार की आलोचना की। इसके साथ ही उन्होंने उच्चतम न्यायालय के 29 मई, 2026 के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु की दायर पुनर्विचार याचिका की स्थिति पर स्पष्टता मांगी।

श्री स्टालिन ने कहा कि 151 सुपर-स्पेशियलिटी सीटों के नुकसान का सीधा असर तमिलनाडु में उच्च योग्य सरकारी डॉक्टरों की उपलब्धता पर पड़ेगा, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर लाखों मरीज प्रभावित होंगे। उन्होंने जवाबदेही की मांग करते हुए राज्य सरकार से सरकारी डॉक्टरों और आम जनता को विस्तृत स्पष्टीकरण देने का आग्रह किया।

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