पटना, मार्च 20 -- कभी पारंपरिक खेती के लिए पहचाने जाने वाले बिहार में अब खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। यहां के किस वैज्ञानिक और शोधकर्ता मिलकर ऐसे प्रयोग कर रहे हैं, जो न सिर्फ कृषि की दिशा बदल रहे हैं बल्कि किसानों की आमदनी में भी इजाफा कर रहे हैं।

बिहार में अब ड्रैगन फ्रूट के साथ-साथ रबड़ की खेती भी संभव होती दिख रही है जो पहले दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर राज्यों तक सीमित मानी जाती थी।

मुंगेर, कटिहार जैसे कई जिले इस बदलाव की नई कहानी लिख रहे हैं। मुंगेर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग से रिसर्च कर रहे बबलू कुमार ने इस दिशा में पहल करते हुए केरल के किसानों और वैज्ञानिकों से संवाद स्थापित किया। उनके प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि पहले पायलट प्रोजेक्ट के तहत बीआरएम कॉलेज परिसर में लगभग एक कट्ठा जमीन पर रबड़ के पौधे लगाए गए और महज पांच महीने में ही पौधों की वृद्धि संतोषजनक रही। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की जलवायु भी रबड़ की खेती के लिए अनुकूल हो सकती है।

यदि यह प्रयोग सफल होता है तो यह राज्य के किसानों के लिए एक नया विकल्प बन सकता है। इस पहल को आगे बढ़ते हुए अगले मानसून में खगड़िया जिला के परबत्ता क्षेत्र में करीब दो एकड़ भूमि पर रबड़ की खेती का विस्तार करने की योजना है, जिससे आने वाले दिनों में बिहार के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ व्यवसायिक खेती में अपनी अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं।

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