बेंगलुरु , जून 05 -- कर्नाटक के नये मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आखिरकार वह लक्ष्य पूरा कर लिया है जिसकी कोशिश में उन्होंने बरसों लगा दिए। मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जा चुकी है, जश्न मनाए जा चुके हैं और कांग्रेस ने आखिरकार कर्नाटक में सत्ता के उत्तराधिकार का सवाल सुलझा लिया है। लेकिन राजनीति अगर कोई सबक सिखाती है, तो वह यह है कि सत्ता हासिल करना उसे संभालने से कहीं ज़्यादा आसान होता है।

नये मुख्यमंत्री एक जबरदस्त छवि के साथ दफ्तर में कदम रख रहे हैं। वे कांग्रेस के सबसे बड़े संकटमोचक, एक बेहतरीन संगठनकर्ता और ऐसे नेता हैं जो कई राजनीतिक तूफानों को झेलकर पार्टी के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में शामिल हुए हैं। इसके बावजूद, उनके सामने ऐसी खड़ी चुनौतियाँ हैं, जैसी उन्होंने पहले कभी नहीं देखीं। पहली बात तो यह है कि उन्हें सत्ता तो मिली है, लेकिन पूरा नियंत्रण नहीं। भले ही श्री सिद्दारमैया ने मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली कर दी है, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी राजनीतिक मौजूदगी अब भी बड़ा स्थान रखती है। नए मंत्रिमंडल के कई सदस्य इस वरिष्ठ नेता के कारण ही आगे बढ़े हैं और वे अब भी उनके राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा हैं। पद का हस्तांतरण भले ही पूरा हो गया हो, पर प्रभाव का हस्तांतरण होना बिल्कुल अलग बात है। कांग्रेस नेतृत्व ने इस बदलाव को बहुत सहज दिखाया है लेकिन कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास कुछ और ही कहता है। भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विताएं सिर्फ हाथ मिलाने और एक चित्र खिंचवाने से खत्म नहीं होतीं, बल्कि वे और ज़्यादा चतुर तथा बारीक रूप ले लेती हैं। इसलिए, शिवकुमार का पहला काम विपक्ष को हराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सत्तारूढ़ दल उनके पीछे एकजुट खड़ा रहे।

इसके बाद आता है जातिगत सर्वेक्षण, जो शायद नए मुख्यमंत्री का इंतज़ार कर रही राजनीतिक रूप से संवेदनशील फ़ाइल है। श्री सिद्दारमैया सरकार ने अपने आखिरी दिनों में इस सर्वेक्षण को स्वीकार किया था, जिसने प्रतिनिधित्व, आरक्षण और राजनीतिक ताकत पर पुरानी बहसों को फिर से जिंदा कर दिया है। हर समुदाय इसमें या तो एक मौका देख रहा है या फिर खतरा। इसे लागू करने का कोई भी फैसला किसी के लिए जीत तो किसी के लिए हार लेकर आएगा। यह न केवल सरकार चलाने का, बल्कि राजनीतिक हौसले का भी इम्तिहान होगा।

कांग्रेस के लिए यह मुद्दा और भी भारी है। जो दल राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना की वकालत करता है, वह उस राज्य में हिचकिचाता हुआ नहीं दिख सकता, जहाँ वह खुद सत्ता में है।अगर जातिगत सर्वेक्षण एक राजनीतिक बारूदी सुरंग है, तो बेंगलुरु एक प्रशासनिक चुनौती। भारत की यह प्रौद्योगिकी राजधानी आज भी यातायात जाम और कमजोर बुनियादी ढांचे से जूझ रही है। यहां अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि शहर का विकास उसके नियोजन से कहीं आगे निकल गया है। श्री शिवकुमार, जो खुद को लंबे समय से एक निर्माता और विकासकर्ता के रूप में पेश करते आए हैं, उन्हें समझ आएगा कि जनता अब वादों से नहीं, बल्कि सही सड़कों, साफ नालों और ऐसे सफर से खुश होती है जो उनका आधा दिन न खा जाए। वृहत बेंगलुरु प्राधिकरण के आगामी चुनाव इस नयी सरकार पर जनता के भरोसे का पहला बड़ा इम्तिहान होंगे।

फिर भी, ये सभी चुनौतियाँ एक बड़ी कहानी का हिस्सा मात्र हैं। कांग्रेस ने श्री शिवकुमार को सिर्फ सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री नहीं बनाया है। उन्हें चुनाव जीतने के लिए यह जिम्मेदारी दी गई है। कर्नाटक में दोबारा उसी सरकार को चुनने का रिवाज नहीं रहा है। पिछले लगभग चार दशकों से, यहाँ की जनता पूरी निरंतरता के साथ बारी-बारी से दलों को बदलती रही है। इस ढर्रे को तोड़ना और 2028 में कांग्रेस को लगातार दूसरी बार जीत दिलाना ही असली इनाम है। यही मकसद इस बदलाव के पीछे के राजनीतिक गणित को समझाता है। श्री शिवकुमार से उम्मीद की जा रही है कि वे वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन को मजबूत करेंगे और साथ ही पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों के उस बड़े गठबंधन को भी साथ रखेंगे, जिसने 2023 में कांग्रेस को जीत दिलाई थी। यह एक ऐसा संतुलन है जिसे कहना आसान है और साधना बेहद मुश्किल है।

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