नयी दिल्ली , मई 04 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2026' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राज्यों को उनके महाधिवक्ताओं के माध्यम से नोटिस देने का निर्देश दिया, हालांकि अदालत ने कानून के संचालन पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
पीठ ने इस पर गौर किया कि चूंकि कानून अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है, इसलिए इस स्तर पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं है।
अब इस पूरे मामले को मुख्य न्यायाधीश की ओर से गठित की जाने वाली तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ के समक्ष विस्तार से सुनवाई के लिए रखा जायेगा।
इस नये संशोधन को 31 मार्च 2026 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली थी, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान और अधिकारों से जुड़े कानूनी ढांचे में व्यापक बदलाव किये गये हैं। अधिनियम में 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति' की परिभाषा को अधिक सटीक बनाने का प्रयास किया गया है और गंभीर अपराधों जैसे कि अपहरण, अंग-भंग, नसबंदी या जबरन हार्मोन थेरेपी के माध्यम से लिंग परिवर्तन जैसे कृत्यों के लिए दंड के कड़े प्रावधान शामिल किये गये हैं।
केंद्र का तर्क है कि इस ढांचे का उद्देश्य उन व्यक्तियों को लक्षित सुरक्षा प्रदान करना है, जो जैविक कारकों के कारण वास्तविक सामाजिक बहिष्कार का सामना करते हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने लैंगिक पहचान के आधार के रूप में 'स्व-पहचान' हटाये जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने दलील दी कि संशोधित कानून प्रभावी रूप से व्यक्तियों को चिकित्सा प्रमाणन के बिना अपनी पहचान बताने से रोकता है, जो उच्चतम न्यायालय के 2014 के ऐतिहासिक 'नालसा' फैसले का उल्लंघन है।
श्री सिंघवी ने कहा कि नालसा फैसले ने स्व-पहचान को गरिमा का अधिकार माना था, जिसे यह संशोधन पूरी तरह से निष्प्रभावी कर देता है। उन्होंने आशंका जतायी कि इससे वर्तमान में चल रहे उपचार और पहचान संबंधी प्रक्रियाओं में भारी व्यवधान पैदा होगा।
पीठ ने हालांकि स्व-पहचान के अधिकार के संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल उठाये। न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि यदि केवल स्व-घोषणा को ही आधार मान लिया जाए तो आरक्षण और अन्य सरकारी लाभों का अनुचित लाभ उठाने के लिए इस दर्जे का गलत दावा करने का जोखिम बढ़ सकता है।
अदालत ने कहा कि इस संशोधन ने कानून के उस आधार को ही बदल दिया है, जिस पर नालसा मामले में विचार किया गया था। अब स्व-निर्धारण के स्थान पर एक संस्थागत 'चिकित्सा मूल्यांकन' की व्यवस्था की गयी है।
श्री सिंघवी ने इन आशंकाओं को निराधार बताते हुए तत्काल रोक लगाने पर जोर दिया, लेकिन शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की वैधता की जांच उचित समय पर की जायेगी।
यह संशोधन अधिनियम वर्तमान में दिल्ली, केरल और कर्नाटक उच्च न्यायालयों में भी कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
कानून के अन्य पहलुओं में आधिकारिक दस्तावेजों में बदलाव की प्रक्रिया और राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद का पुनर्गठन शामिल है, जिसे अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय रोटेशन प्रणाली पर आधारित बनाया गया है।
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