अगरतला , अप्रैल 28 -- त्रिपुरा मानवाधिकार आयोग (टीएचआरसी) ने अगरतला स्मार्ट सिटी लिमिटेड को एमबीबी कॉलेज झील प्रदूषण मामले से जुड़े गुम दस्तावेजों के संबंध में पूर्व सीईओ डॉ. शैलेश कुमार यादव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया है। यह मामला पिछले साल दिल्ली स्थित स्वास्थ्य मंत्रालय में उनके प्रतिनियुक्ति पर स्थानांतरित होने के बाद सामने आया था।
सुनवाई के दौरान, एएससीएल ने लापता रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कार्यवाही स्थगित करने का अनुरोध किया और सूचित किया कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों से वही दस्तावेज दोबारा प्राप्त करने के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन दायर किया है।
इस याचिका पर टीएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरिंदम लोध ने असंतोष व्यक्त करते हुए इस आचरण को लापरवाहीपूर्ण एवं गैरजिम्मेदाराना करार दिया और चेतावनी दी कि एजेंसी को मुआवजे के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
उन्होंने एएससीएल की प्रशासनिक जवाबदेही और रिकॉर्ड प्रबंधन के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाए, क्योंकि यह मुद्दा एक शिकायत की सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसमें टीएचआरसी ने डॉ. यादव के तबादले के बाद महत्वपूर्ण मामले के दस्तावेजों के गायब होने पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।
टीएचआरसी ने पाया कि सरकारी अधिकारियों के तबादलों के बाद होने वाली ऐसी घटनाएं चिंताजनक हैं और कानूनी कार्यवाही की निष्पक्षता को कमजोर करती हैं । इसके साथ ही मामले में देरी करने के लिए टालमटोल की रणनीति अपनाने के लिए एएससीएल की कड़ी आलोचना भी की गयी है।
वन विभाग द्वारा दी गई जानकारी से पता चला है कि रुद्रसागर झील त्रिपुरा में एकमात्र आधिकारिक रूप से अधिसूचित आर्द्रभूमि है, जबकि त्रिपुरा आर्द्रभूमि प्राधिकरण की एक रिपोर्ट में एमबीबी कॉलेज झील पर स्मार्ट सिटी परियोजना में अनियमितताओं को उजागर किया गया है ।
शिकायतकर्ता के वकील ने गंभीर आपत्तियां उठाते हुए आरोप लगाया कि एमबीबी कॉलेज झील को पहले आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता प्राप्त थी लेकिन उचित अधिसूचना के बिना इसका नाम आधिकारिक अभिलेखों से हटा दिया गया और आगे तर्क दिया कि झील परियोजना को अगरतला नगर निगम को हस्तांतरित करना त्रिपुरा भूमि राजस्व अधिनियम, 1961 के प्रावधानों का उल्लंघन है।
उन्होंने एएससीएल और उच्च शिक्षा विभाग के बीच हुए समझौता ज्ञापन की वैधता पर सवाल उठाया और दावा किया कि उचित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यह मामला पर्यावरण और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए जनहित में दायर किया गया था और झील की बिगड़ती पारिस्थितिक स्थिति को उजागर किया।
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