दरभंगा , अप्रैल 09 -- कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. कुणाल कुमार झा गुरूवार को कहा कि ज्योतिष काल गणना करने वाला अति विशाल एवं प्राचीन शास्त्र है।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में "ज्योतिषस्य व्यावहारिकं ज्ञानम्" विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता प्रो. कुणाल कुमार झा ने कहा कि ज्योतिष काल गणना करने वाला अति विशाल एवं प्राचीन शास्त्र है। इसका प्रारंभिक ज्ञान सबके लिए आवश्यक एवं उपयोगी है। उन्होंने कहा कि छह वेदांगों में ज्योतिष को नेत्र कहा जाता है, जिसके प्रमुख तीन अंग हैं। सूर्य सृष्टि की उत्पत्ति का मुख्य कारक है जो संसार की आत्मा भी कहा जाता है। सौरमंडल के केन्द्र में स्थित सूर्य निरंतर गतिमान रहता है, जिसकी 12 राशियां हैं, जिन्हें विभिन्न दिशाओं में बांटा गया है। 27 नक्षत्र हैं, जिनका गहरा प्रभाव सभी जीव-जन्तुओं पर पड़ता है। उन्होंने संस्कारों की चर्चा करते हुए कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित 'शिशुबोध' ग्रन्थ के अध्ययन से पंचांग का बोध अत्यंत सरल हो जाता है।
बीज वक्ता डॉ. आर एन चौरसिया ने कहा कि ज्योतिष भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो जीवन को समझने और सही दिशा देने का भी विज्ञान है। इसका हमारे दैनिक जीवन से बहुत ही गहरा संबंध है। उन्होने कहा कि पारंपरिक दृष्टि से ज्योतिष भाग्य और कर्म के मिश्रण को दिखाता है और बतलाता है कि किस समय कौन-सा प्रयास करने पर फल बेहतर मिल सकता है। ज्योतिष हमें महत्वपूर्ण निर्णयों- यज्ञ, विवाह, गृह-प्रवेश, मुंडन, उपनयन, व्यापार- प्रारंभ आदि के शुभ मुहूर्त चुनने और अनुकूलता से कार्य प्रारंभ कर अपने प्रयासों के फल को अधिक लाभकारी बनाने में मदद करता है। इसका उद्देश्य भाग्य पर आश्रित होना नहीं, बल्कि वर्तमान कर्म को जागरुक एवं सुदृढ़ बनाकर भविष्य को उन्नत करना है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित