नयी दिल्ली , सितंबर 5 -- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण 'एक्सेस एंड बेनिफिट-शेयरिंग' (एबीएस) ढांचे के प्रभावी क्रियान्वयन में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए संचयी राजस्व वितरण में 200 करोड़ रुपये से अधिक का आंकड़ा पार कर लिया है। इसी कड़ी में प्राधिकरण ने बीज निर्माण करने वाली निजी कंपनियों से वसूल की गयी 8.23 करोड़ रुपये की राशि को 27 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों के जैव विविधता बोर्डों एवं परिषदों को हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

यह जानकारी यहां जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में दी गयी है। यह कदम देश में जैविक संसाधनों के उपयोग से मिलने वाले फायदों को सीधे पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास कार्यों की ओर मोड़ने की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।

भारतीय जैव विविधता कानून के अनुसार, जब कोई व्यावसायिक संस्था या कंपनी देश के जैविक संसाधनों का उपयोग कर व्यापारिक लाभ कमाती है, तो उसे उस मुनाफे का एक निश्चित अंश प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और स्थानीय कृषि व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के लिए लौटाना अनिवार्य होता है। इसी पारदर्शी व्यवस्था के तहत 'मेसर्स ननहेम्स इंडिया', 'मेसर्स ईस्ट वेस्ट सीड्स' और 'मेसर्स बायर साइंस एंड इनोवेशन' जैसी प्रमुख कंपनियों से करेला, भिंडी, मिर्च और प्याज के बीजों तथा जैविक संसाधनों के शोध और वाणिज्यिक उपयोग के एवज में यह एबीएस राशि वसूल की गई है।

चूंकि इन कंपनियों ने बीजों को किसी एक व्यक्ति या किसान के बजाय खुले बाजार और व्यापारियों के जरिए हासिल किया था, इसलिए सीधे तौर पर किसी एक किसान या गांव की पहचान करना संभव नहीं था। ऐसे में प्राधिकरण ने विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर कृषि मंत्रालय के जारी फसल-वार बुआई क्षेत्र के आंकड़ों को आधार बनाया है। इसके तहत जिस राज्य में जिस फसल का जितना अधिक क्षेत्रफल और पैदावार है, उस राज्य के जैव विविधता बोर्ड को उसी अनुपात में एबीएस की राशि आवंटित की गयी है।

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