पटना , अगस्त 09 -- िहार में आत्मनिर्भरता व स्वरोजगार की गाथा लिख रही जीविका दीदियों ने भागलपुर की सदियों पुरानी हैंडलूम सिल्क की विरासत को अपने हाथों से नया स्वरूप दिया है। जीविका के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जीविका बुनकर परिवारों की महिलाओं को संगठित कर उन्हें सिल्क बुनाई, आधुनिक डिजाइन, रंग संयोजन, फिनिशिंग और उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे पारंपरिक भागलपुरी सिल्क को आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप तैयार करने में काफी मदद मिल रही है। भागलपुर को देशभर में 'सिल्क सिटी' के रूप में पहचान जाता है। भागलपुरी रेशम की खास बुनावट, प्राकृतिक चमक और अनोखा शिल्पकला इसकी असली पहचान है। हालांकि पारंपरिक हथकरघा बुनकर परिवार लंबे समय से कम आय, पुराने तकनीकी संसाधनों, सीमित बाजार पहुंच और बिचौलियों पर निर्भरता जैसी चुनौतियों का सामना करते रहे हैं। जीविका दीदियों ने इन चुनौतियों को दूर करने के लिए महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों और उत्पादक समूहों से जोड़ने की पहल की है।

वहीं जीविका दीदियो को प्रशिक्षण से सिल्क व्यवसाय में कई नयी जानकारियां हासिल हूई है। महिलाओं को उन्नत बुनाई तकनीक, करघा संचालन, रंगाई और फिनिशिंग के साथ आधुनिक डिजाइन और पैटर्न विकसित करने का प्रशिक्षण भी दिया गया है। जिससे महिलाओं को बचत, आंतरिक ऋण और बैंक ऋण की सुविधा से जोड़ा गया है। इससे वे कच्चे माल, करघे, उपकरण और कार्यशील पूंजी में निवेश कर पा रही हैं। आर्थिक सहयोग मिलने से बुनकर परिवारों को पूरे वर्ष बुनकरी का काम जारी रखने में मदद मिल रहा है।

भागलपुरी हैंडलूम सिल्क को नई पहचान देने के लिए उत्पादों में भी विविधता लाई गई है। सिल्क साड़ी, दुपट्टे, स्टोल, ड्रेस मटेरियल और होम फर्निशिंग जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। आकर्षक पैकेजिंग और लेबलिंग के साथ बेहतर मार्केटिंग पर जोर दिया जा रहा है, जिससे जीविका दीदियों के बनाए भागलपुरी सिल्क उत्पादों को विशिष्ट बाजार पहचान मिल सके।

वहीं महिलाओं को उत्पादक समूहों और उत्पादक कंपनियों के रूप में संगठित किए जाने से रेशम के धागे और अन्य कच्चे माल की सामूहिक खरीद संभव हुई है। इससे उत्पादन लागत कम करने और सामूहिक विपणन के जरिये बेहतर कीमत हासिल करने में मदद मिली है। जीविका ने प्रदर्शनियों, मेलों, शहरी बाजारों, संस्थागत खरीदारों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से भी इन समूहों को जोड़ने की पहल की है।

बिहार सरकार के इस मुहिम से महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ उनके सामाजिक जीवन पर भी पड़ा है। बढ़ी हुई आय से परिवार के पोषण, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। वहीं, महिलाओं में आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता भी विकसित हुई है। महिला सशक्तीकरण, मजबूत संस्थागत ढांचे, उत्पाद की गुणवत्ता और बाजार से स्थायी जुड़ाव के जरिए भागलपुरी सिल्क बिहार की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण उद्यम का प्रतीक बन रहा है। दस्तावेज के अनुसार, कई जीविका दीदियां अब मास्टर ट्रेनर, उद्यमी और सामुदायिक नेता के रूप में भी अपनी भूमिका निभा रही हैं। जीविका के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से भागलपुर की हैंडलूम सिल्क परंपरा को संरक्षित करने के साथ उसे आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा रहा है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित