नयी दिल्ली , जुलाई 26 -- ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (टीएएएस) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के सहयोग से यहां "आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) और जीनोम-संपादित (जीई) फसलों के नियमों एवं मंजूरी में सुधार" विषय पर एक उच्च स्तरीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन किया।

यहा जानकारी यहां जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में दी गयी। यह गोलमेज बैठक राष्ट्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए जीएम/जीई फसलों की कुशल मंजूरी, नियामक दक्षता और जैव सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने वाला रोडमैप तैयार करने के लिए आयोजित की गई थी।

इस आयोजन में नीति निर्माताओं, कृषि वैज्ञानिकों, नियामकों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों सहित 80 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत के कृषि जैव प्रौद्योगिकी नियामक ढांचे के आधुनिकीकरण पर विचार-विमर्श करना था।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने राष्ट्रीय महत्व के इस मुद्दे पर रचनात्मक संवाद के लिए सभी प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाने की पहल की सराहना की। उन्होंने विज्ञान-आधारित कृषि नवाचारों को आगे बढ़ाने के लिए आईसीएआर की प्रतिबद्धता दोहराई और खाद्य व पोषण सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता तथा टिकाऊ कृषि विकास हासिल करने के लिए आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी के सुरक्षित उपयोग को आसान बनाने वाले संतुलित नियामक तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन में यह बात सामने आयी कि जीनोम-संपादन प्रौद्योगिकियों में तेजी से होते विकास, बदलते वैश्विक नियामक तौर-तरीकों और जलवायु-अनुकूल व टिकाऊ कृषि की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए जीएम और जीई फसलों के लिए भारत के नियामक ढांचे की समीक्षा और आधुनिकीकरण आवश्यक हो गया है। देश के पास जीन-संपादित उत्पादों की कुछ श्रेणियों के लिए एक अलग नियामक दृष्टिकोण है, लेकिन पूरी प्रणाली में स्पष्टता, सामंजस्य बनाने और उनमें सुधार के लिए और अधिक सुधारों की आवश्यकता है।

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