रांची , अक्टूबर 03 -- झारखंड में माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ रख रही हैं।
तीन दिनों तक चलने वाला यह पर्व आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता है। इस वर्ष कल दो अक्टूबर से शुरू हुआ है। आज माताएं कठिन निर्जला उपवास रखेंगी और कल भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी।
जितिया पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। सप्तमी के दिन व्रती महिलाएं स्नान के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। झारखंड के कई इलाकों में इस दिन मड़ुआ की रोटी और नोनी का साग खाने की विशेष परंपरा है। इसके बाद अष्टमी के दिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। इस दौरान अन्न और जल का सेवन नहीं किया जाता। प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा और जितिया व्रत की कथा सुनने की परंपरा है। कथा में राजा जीमूतवाहन के त्याग और संतान की रक्षा से जुड़ी मान्यताओं का वर्णन मिलता है। चील और सियारिन की कथा भी जितिया व्रत से जुड़ी प्रमुख धार्मिक कथा है। व्रत के तीसरे और अंतिम दिन नवमी तिथि को पारण किया जाता है।
धर्म जानकारों के अनुसार इस वर्ष व्रत का पारण 4 अक्टूबर रविवार को सुबह 7 बजकर 28 मिनट के बाद किया जाएगा। इसके बाद व्रती महिलाएं जल और अन्न ग्रहण कर सकेंगी। हालांकि लंबे समय तक निर्जला रहने के बाद पारण में जल्दबाजी नहीं करने की सलाह दी जाती है। पहले पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ और हल्का, आसानी से पचने वाला भोजन लेना बेहतर माना जाता है।
जितिया व्रत को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराओं और नियमों में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। धार्मिक आस्था के साथ इस दौरान स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। व्रत के दौरान अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, बेहोशी या अचानक तबीयत बिगड़ने जैसी स्थिति महसूस होने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं, किसी बीमारी से पीड़ित लोगों और नियमित दवा लेने वालों को निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
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