मुंबई , अप्रैल 15 -- महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि राज्य सरकार जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी संक्रामक बीमारियों को लेकर पूरी तरह सतर्क है और इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए निवारक उपायों एवं जन जागरूकता पर विशेष जोर देते हुए टीकाकरण अभियान में तेजी लायी गयी है।

श्री फडणवीस ने बुधवार को यहां कहा कि नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस बीमारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को समन्वय के साथ काम करना होगा।

वर्ष 2015-16 के दौरान देश के अन्य राज्यों में जापानी इंसेफेलाइटिस के खिलाफ टीकाकरण अभियान शुरू हुआ था। उसी समय विदर्भ के जिलों में कुछ मामले सामने आये थे, लेकिन महाराष्ट्र में टीकाकरण शुरू नहीं हुआ था। तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पर ध्यान दिया और राज्य में टीकाकरण अभियान शुरू करने के लिए केंद्र सरकार से विशेष अनुरोध किया। इन प्रयासों के कारण अब मामलों की संख्या लगभग शून्य हो गयी है।

यह बीमारी मुख्य रूप से मच्छरों से फैलती है और मस्तिष्क को प्रभावित करती है। इससे गंभीर जटिलताएं, दौरे और यहां तक कि मृत्यु भी हो सकती है। हालांकि 2021 से मार्च 2026 के बीच राज्य में मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही है, लेकिन कुछ जिलों में मामले दर्ज किये गये हैं। 2022 में दो मामले, 2023 में पांच मामले, 2024 में पांच मामले और दो मौतें और 2025 में सात मामले और एक मौत दर्ज की गयी। मार्च 2026 तक कोई नया मामला सामने नहीं आया है। अधिकतर मामले विदर्भ के नागपुर, भंडारा, चंद्रपुर और गढ़चिरौली जिलों में पाये गये हैं।

अप्रैल 2025 और फरवरी 2026 के बीच टीकाकरण अभियान में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। पहली खुराक का कवरेज 89.26 प्रतिशत है, जबकि दूसरी का 78.68 प्रतिशत है। धाराशिव (99.59 प्रतिशत), लातूर (97.84 प्रतिशत) और सोलापुर (95 प्रतिशत से अधिक) जैसे जिलों ने असाधारण प्रदर्शन किया है।

जापानी इंसेफेलाइटिस के निदान के लिए नागपुर, गढ़चिरौली, सेवाग्राम (वर्धा), भंडारा और गोंदिया में पांच सेंटिनल सेंटर कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 16 जिलों में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) स्थापित किये गये हैं, जिससे आवश्यक उपचार सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, विदर्भ जापानी इंसेफेलाइटिस के प्रति सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। मच्छरों के पनपने और सूअरों तथा पक्षियों के संपर्क के कारण ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में संक्रमण का जोखिम अधिक है। कुछ शहरी और उपनगरीय क्षेत्रों में भी बीमारी फैलने की संभावना है।

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