भुवनेश्वर , मई 16 -- ओडिशा में जाने-माने पुरातत्ववेत्ता डॉ. सुब्रत कुमार आचार्य ने भारत की पुरानी पांडुलिपियों के विशाल भंडार के व्यवस्थित पाठ-संपादन की तुरंत जरूरत पर बल देते हुए कहा कि देश की साहित्यिक संपदा का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अन्वेषण से अछूता है।

डॉ. आचार्य ने भुवनेश्वर में एसओए डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी में पाठ-संपादन पर एक सप्ताह तक चलने वाली कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की समृद्ध साहित्यिक परंपरा, खासकर संस्कृत महाकाव्यों और पुराने ग्रंथों का विद्वानों के लिए बहुत अहमियत रखता है लेकिन अब तक उपलब्ध पाठ में से केवल लगभग 20 प्रतिशत का ही संपादन किया गया है। उन्होंने बताया कि बाकी 80 प्रतिशत पांडुलिपियां अभी भी अनछुई पड़ी हैं, जिससे शोधार्थियों और अध्येताओं को कीमती ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ज्ञान से वंचित होना पड़ता है।

उल्लेखनीय है कि इस कार्यशाला में 41 अध्येता शामिल हुए। इसे भारत की प्राचीन संस्कृति और विरासत के प्रसार, संरक्षण और जीर्णोद्धार (पीपीआरएसीएचआईएन) के लिए एसओए केंद्र ने आयोजित किया है। इसका मकसद अध्येताओं को पाठ-संपादन के लिए जरूरी विशेष हुनर सिखाना है। डॉ. आचार्य ने कहा कि पांडुलिपियों के सही संपादन से अकादेमिक शोध को काफी लाभ होगा लेकिन उन्होंने काम की जटिलता और इस विषय पर संस्थाओं के जोर की कमी के कारण अध्येताओं के बीच कम होती दिलचस्पी पर दुख जताया।

उन्होंने कहा, "पाठ-संपादन एक मुश्किल काम है और बदकिस्मती से विश्वविद्यालय इसे काफी अहमियत नहीं दे रहे हैं, जबकि ओडिशा में पुराने साहित्य का खजाना है।" डॉ. आचार्य ने भारत के साहित्य की फिर से खोज की ऐतिहासिक यात्रा पर रोशनी डालते हुए कहा कि यूरोपियन इतिहासकारों ने शुरू में यह मान लिया था कि भारत में दस्तावेजी इतिहास या सांस्कृतिक गहराई की कमी है।

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