जालौन , जून 13 -- संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। विश्व भर में प्रतिवर्ष 21 जून को विश्व संगीत दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1982 में फ्रांस के तत्कालीन संस्कृति मंत्री जैक लैंग और संगीतकार मॉरिस फ्लरेट की पहल पर शुरू हुए इस दिवस का उद्देश्य संगीत की सार्वभौमिक शक्ति को सम्मान देना और उसे जन-जन तक पहुंचाना था।
इसी भावना को साकार करते हुए उत्तर प्रदेश के जालौन जिला मुख्यालय उरई के प्रतिष्ठित दंपति डॉ. हरीमोहन पुरवार और श्रीमती संध्या पुरवार ने वर्षों की मेहनत से एक अनूठा "संगीत संसार" तैयार किया है। यह संग्रह आज संगीत प्रेमियों, शोधकर्ताओं और कला-संरक्षकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
वरिष्ठ साहित्य इतिहासकार डॉ. हरीमोहन पुरवार ने शनिवार को यूनीवार्ता से बातचीत में कहा कि उनके संग्रह में भारत सहित दुनिया के कई देशों की ऐसी दुर्लभ मुद्राएं और नोट सुरक्षित हैं, जिन पर संगीत, नृत्य और कला की झलक दिखाई देती है। इनमें यूक्रेन, घाना, फिजी, अमेरिका, ट्रिनिडाड, नेपाल, हंगरी, इजराइल, स्पेन, मोनाको, मालदीव, भूटान और श्रीलंका जैसे देशों की मुद्राएं शामिल हैं, जिन पर विभिन्न वाद्य यंत्रों का अंकन किया गया है।
संग्रह में किर्गिस्तान के नोट पर अंकित 'कोमूज' वाद्य यंत्र, बेलारूस के नोट पर बैले नृत्य और फ्रांस के नोट पर महान संगीतकार हेक्टर बार्लियोज का चित्र विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। भारत के संदर्भ में वर्ष 1981 में बाल दिवस पर जारी 100 रुपये मूल्य का अर्ध-रजतीय अपरिचालित सिक्का भी संग्रह का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें बच्चों को वाद्य यंत्र बजाते और नृत्य करते हुए दर्शाया गया है।
इस संग्रह की अमूल्य निधियों में भक्त कवयित्री मीराबाई, संत तुकाराम और महान गायिका डॉ. एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी से संबंधित मुद्राएं भी शामिल हैं। वहीं, थाईलैंड की मुद्रा पर भगवान श्रीकृष्ण की नागनाथ लीला तथा पलाऊ देश के रंगीन सिक्कों पर भगवान शिव, भगवान कृष्ण और देवी सरस्वती के चित्र भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाते हैं।
पुरवार दंपति का यह "संगीत संसार" केवल सिक्कों और नोटों तक सीमित नहीं है। इसमें घंटा, घड़ियाल, घंटियां, रमतूला, चटकोला, सिंगारी, कैकड़िया, बांसुरी, शंख, डमरू, झांझ और करताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र भी सुरक्षित हैं। साथ ही पुराने ग्रामोफोन, ट्रांजिस्टर और टेप रिकॉर्डर संगीत के विकास की ऐतिहासिक यात्रा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।
संग्रह में भगवान नटराज, देवी सरस्वती और राधा-कृष्ण की अनेक मूर्तियां भी शामिल हैं। प्राकृतिक शंखों पर उकेरी गई बांसुरी बजाते श्रीकृष्ण और वीणावादिनी मां सरस्वती की आकृतियां इसकी कलात्मकता को और समृद्ध बनाती हैं। इस अनूठे संग्रह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा डाक टिकटों का विशाल भंडार भी है। इनमें उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, वी.जी. जोग, पंडित रविशंकर, उस्ताद अली अकबर खां, वीणा धनम्मल और उस्ताद शबरी खान जैसी विभूतियों से संबंधित टिकट सुरक्षित हैं। इसके अलावा पंडित भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, पंडित जसराज, मन्ना डे, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, गीता दत्त, भूपेन हजारिका और पंकज कुमार मलिक जैसे महान गायकों पर आधारित डाक टिकट भी इस संग्रह की शोभा बढ़ाते हैं।
संग्रह की सबसे दुर्लभ धरोहरों में बलुआ पत्थर से निर्मित लगभग छह इंच ऊंची वीणाधारिणी देवी सरस्वती की प्रतिमा है, जिसे 12वीं से 14वीं शताब्दी के मध्यकाल का माना जाता है। यह प्रतिमा अपने आप में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसके अतिरिक्त पुरवार दंपति ने उड़िया शैली की मां सरस्वती, राधा-कृष्ण, ताड़पत्र पर अंकित नृत्यरत भगवान गणेश, राजपूताना और बुंदेलखंडी शैली की चित्रकृतियों सहित अनेक प्राचीन पेंटिंग्स भी संरक्षित की हैं। स्वर्गलोक की नौ अप्सराओं के चित्र और संगीत विषयक दुर्लभ माचिस के डिब्बों का संग्रह भी यहां देखने को मिलता है।
विश्व संगीत दिवस के अवसर पर पुरवार दंपति का यह संग्रह न केवल संगीत और कला के प्रति उनकी गहरी निष्ठा का परिचायक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का प्रेरणादायी उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। उनका यह "संगीत संसार" वास्तव में संगीत, संस्कृति, इतिहास और अध्यात्म का अद्भुत संगम है, जो हर दर्शक को मंत्रमुग्ध कर देता है।
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