रायपुर/बिलासपुर , मार्च 29 -- छत्तीसगढ़ प्रदेश में महत्वाकांक्षी मानी जाने वाली जल जीवन मिशन योजना अब भुगतान संकट और अनियमितताओं के आरोपों के चलते विवादों में घिरती नजर आ रही है। एक तरफ जहां सरगुजा जिले के अंबिकापुर में बीते शनिवार को ठेकेदारों द्वारा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी ( पीएचई) कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन के बाद मामला और गरमा गया है, वहीं अब दूसरी तरफ आज बिलासपुर से भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई हैं।

सरगुजा में ठेकेदार रजनीकांत अग्रवाल सहित अन्य ने आरोप लगाया कि जल जीवन मिशन के तहत किए गए कार्यों का भुगतान पिछले डेढ़ साल से लंबित है। ठेकेदारों ने चेतावनी दी थी कि यदि 30 मार्च तक भुगतान नहीं किया गया, तो वे कार्यालय में ताला बंद करने के साथ आत्मदाह जैसा कदम उठाने को मजबूर होंगे।

रजनीकांत अग्रवाल ने बताया कि लखनपुर विकासखंड के जुड़वानी में पानी टंकी निर्माण, पाइपलाइन विस्तार और नल कनेक्शन जैसे कार्य पूरे किए जा चुके हैं। पिछले छह महीनों से पानी की आपूर्ति भी हो रही है, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने बिल रोक रखा है। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अधिकारी भुगतान के एवज में कमीशन की मांग कर रहे हैं और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन अभियंता ओमकार सिंह ने संबंधित उप अभियंता को कारण बताओ नोटिस जारी कर जांच के निर्देश दिए हैं। विभाग का कहना है कि जवाब मिलने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

ठेकेदार द्वारा 27 मार्च को कलेक्टर के नाम सौंपे गए ज्ञापन में बताया गया कि लगभग 65 लाख रुपये के कार्य के एवज में अब तक केवल 22 लाख रुपये का भुगतान किया गया है, जबकि शेष राशि एक वर्ष से अधिक समय से लंबित है। साथ ही उप अभियंता पर कमीशन मांगने, ब्लैकमेलिंग और मानसिक प्रताड़ना के आरोप भी लगाए गए हैं।

इधर, बिलासपुर से भी इसी तरह की समस्याएं सामने आई हैं। एक ठेकेदार (नाम प्रकाशित नहीं) ने बताया कि प्रदेशभर में हजारों ठेकेदार पिछले दो वर्षों से भुगतान के लिए भटक रहे हैं। उनके अनुसार करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है, जिससे ठेकेदारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

ठेकेदार ने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय कार्यप्रणाली में भारी अनियमितताएं हैं और योजनाओं का क्रियान्वयन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रहा। जल जीवन मिशन के संबंध में उन्होंने दावा किया कि जमीनी स्तर पर केवल 20 प्रतिशत कार्य ही प्रभावी रूप से दिखाई देता है, जबकि अधिकांश कार्य अधूरे या गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं हैं।

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