मिदनापुर , जून 05 -- दुनिया भर में मौसम को प्रभावित करने वाले 'सुपर अल नीनो' के शुरुआती लक्षण अब सिर्फ प्रशांत महासागर के उपग्रहीय मानचित्रों तक सीमित नहीं हैं। इसके संकेत ग्रामीण बंगाल के सूखते तालाबों, लगातार कम हो रहे भूजल और खेतों की फटी दरारों में साफ़ देखे जा सकते हैं। मानसून की बारिश पर निर्भर यहां के गाँवों में भारी गर्मी की शुरुआत से बहुत पहले ही मौसम का यह डरावना रूप दिखने लगा है।

दक्षिण पश्चिम बंगाल के खेती-किसानी वाले इलाकों में किसान एक नयी और खतरनाक सच्चाई का सामना कर रहे हैं। पंपों ने पानी देना बंद कर दिया है, सर्दियां खत्म होने से पहले ही नहरें सूख रही हैं और भीषण गर्मी के कारण उपजाऊ खेत बंजर हो रहे हैं। पश्चिम मेदिनीपुर के गरबेटा ब्लॉक के उत्तरबिल-भेडुआ गाँव में यह संकट एक बड़ी चेतावनी बन गया है कि कैसे दुनिया भर के मौसम में आ रहा यह बदलाव भारत के गाँवों तक पहुँच चुका है।

मौसम वैज्ञानिकों और मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि साल 2026 के अंत तक एक ताकतवर 'सुपर अल नीनो' सक्रिय हो सकता है। इससे भारत का मानसून कमजोर हो सकता है और देश के एक बड़े हिस्से में भीषण गर्मी एवं सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। लेकिन यहाँ के किसानों के लिए यह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि उनके पैरों के नीचे की हकीकत बन चुका है।

जो तालाब कभी साल भर सिंचाई के काम आते थे, वे अब कीचड़ के गड्ढों में बदल रहे हैं। सबमर्सिबल पंपों और गहरे बोरवेलों के ज़रिए अंधाधुंध पानी खींचने से ज़मीन के नीचे का जलस्तर तेज़ी से गिर गया है। बारिश का कोई भरोसा नहीं रह गया है और लगातार पड़ रही गर्मी मिट्टी की नमी को सोख रही है।

उत्तरबिल-भेडुआ के 68 वर्षीय किसान अनीसुर पठान के लिए यह संकट तब आया जब धान की खेती के बीच में ही उनके सिंचाई पंप ने अचानक पानी छोड़ दिया। कुछ ही दिनों में उनकी खड़ी फसल चिलचिलाती धूप में सूख गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो के कारण प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है, जिससे हवाओं का रुख बदलता है और भारत जैसे देशों में मानसून कमज़ोर पड़ जाता है। श्री पठान कहते हैं, "अब हम ज़मीन पर खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम अनिश्चितता और अपनी फूटी किस्मत के भरोसे खेती कर रहे हैं।"दशकों तक इस इलाके में कुएं उथले होते थे और मानसून का एक भरोसा था। लेकिन पिछले दस सालों में सब कुछ बदल गया। जब बारिश कम हुई, तो ग्रामीणों ने गहरे बोरवेल लगवा लिए। शुरुआत में लगा कि तकनीक से राहत मिल गई है, लेकिन ज़मीन के नीचे एक बड़ा संकट खड़ा हो रहा था। हर साल पानी खींचने से जलस्तर इतना नीचे चला गया कि अब कुएं और साधारण पंप बेकार हो गए हैं। किसानों को अब बहुत गहरे और महंगे बोरवेल करवाने पड़ रहे हैं।

अनुमानों के अनुसार, प्रशांत महासागर के मुख्य हिस्सों में समुद्री सतह का तापमान साल 2025 के अंत से लगातार बढ़ रहा है। इससे इस बात की आशंका बहुत बढ़ गई है कि साल 2026 और 2027 में एक बहुत ही गंभीर अल नीनो का असर देखने को मिलेगा।

यह संकट केवल गाँवों तक सीमित नहीं है। भारत के शहरों में भी इसका असर दिख रहा है, जैसे बेंगलुरु में पानी की भारी किल्लत हो गई और चेन्नई के जलाशय सूखने की कगार पर पहुँच गए।भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि पश्चिम मेदिनीपुर और जंगलमहल के जिलों में 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार खेती के लिए पूरी तरह भूजल पर निर्भर हैं। अल नीनो के कारण जब बारिश कम होती है, तो इन पंपों का खर्च बढ़ जाता है, फसलें बर्बाद होती हैं और गाँवों में आर्थिक तंगी आ जाती है।

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