नई दिल्ली , अप्रैल 29 -- केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बुधवार को यहां कहा कि कंपनियों के निदेशक मंडल को जलवायु जोखिमों को अपने मुख्य निर्णयों में अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए।
श्री गोयल यहां जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित डिजिटल विश्लषण प्लेटफार्म 'क्लाइमेट रेजिलिएंस एनालिटिक्सएंड विजुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम' (क्रैविस) के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि थे।
सीईईडब्ल्यू का बनाया क्रेविस प्लेटफॉर्म इस बात में व्यापक बदलाव ला सकता है कि लगातार गर्म होती दुनिया में भारत अपनी योजनाएं कैसे बनाये। अपनी तरह के पहले इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म क्रेविस को काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने तैयार किया है। इस प्लेटफॉर्म के अनुमान के अनुसार, त्वरित जलवायु परिवर्तन के कारण 1981-2010 के जलवायु आधार (बेसलाइन) की तुलना में अगले दो दशकों में भारत में प्रति वर्ष अतिरिक्त 15 से 40 अत्यधिक गर्म दिन देखे जा सकते हैं।
कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से गर्म रातों में भी सालाना 20 से 40 दिनों की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। गर्म रातें इंसानी सेहत पर बुरा प्रभाव डालती हैं, क्योंकि ये सूर्यास्त के बाद भी शरीर को गर्मी से छुटकारा पाने से रोकती हैं, जिसका सीधा असर श्रमिकों की उत्पादकता, बुनियादी ढांचे की क्षमता और व्यापक आर्थिक लचीलेपन पर पड़ता है।
श्री गोयल ने कहा, " बढ़ता तापमान, गर्म दिनों की बढ़ती संख्या और भारी बारिश की लगातार होती घटनाएं,इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन भारत के लिए मौजूदा समय की वास्तविकता है, जो हमारी अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही है। पिछले एक दशक में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत ने जलवायु कार्रवाई (क्लाइमेट एक्शन) को केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक आर्थिक रूप से व्यवहार्य योजना बनाने की दिशा में काम किया है।
उन्होंने कहा, " आगे चल कर कॉरपोरेट बोर्डरूम को जलवायु जोखिमों को अपने मुख्य निर्णयों में शामिल करना होगा।"वाणिज्य मंत्री ने कहा कि 'क्रेविस' जलवायु सूचनाओं के क्षेत्र में दुनिया भर के लिए भारत की एक अनूठी पेशकश साबित हो सकता है। यह भारत के बढ़ते 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (डीपीआई) में एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसने पहले ही यूपीआई, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) और वैक्सीन मैत्री जैसी सफलताओं को देखा है।
उन्होंने कहा, " उम्मीद है कि कंपनियां निवेश के मार्गदर्शन, जोखिमों के आकलन और प्रत्येक चुनौती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य अवसर में बदलने के लिए क्रेविस जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करेंगी।"'क्रेविस' प्लेटफॉर्म 40 से अधिक वर्षों के ऐतिहासिक जलवायु आंकड़ों को 2030-2050 और 2051-2070 तकका अनुमान देता है। यह विभिन्न उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े परिदृश्यों के तहत 279 संकेतकों के आधार पर जिला-स्तरीय विश्लेषण करने में सक्षम है। यह जलवायु के आंकड़ों को विभिन्न क्षेत्रीय आंकड़ों के साथ, जैसे बिजली का बुनियादी ढांचा, कृषि, भूमि उपयोग और जनस्वास्थ्य, जोड़कर देखने और समझने की सुविधा भी देता है। यह प्लेटफॉर्म 'कोलैबोरेटिव डेटा कॉमन्स' (साझा डेटा मंच) के रूप में ओपन और इंटरऑपरेबल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित है।
इसके विकास में रोहिणी नीलेकणि फिलैंथ्रोपीज, एचएसबीसी फाउंडेशन, स्पेक्ट्रम इम्पैक्ट, इंडिया क्लाइमेट कोलैबोरेटिव, और रेनमैटर फाउंडेशन ने सहयोग किया है।
डॉ अरुणाभा घोष, सीईओ, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के सीईओ डॉ अरुणाभा घोष ने कहा, " सीईईडब्ल्यू में हमारा मानना है कि बेहतर सूचनाएं व्यापक रूप से सुलभ होनी चाहिए। यह प्लेटफॉर्म जलवायु लचीलेपन (क्लाइमेट रेजिलिएंस) के लिए हमारे 12 वर्षों के कार्यों पर आधारित है। "'क्रेविस' के निष्कर्षों के अनुसार, भारत के 281 डेटा सेंटर में से आधे से अधिक पहले से ही प्रति वर्ष 90 से अधिक दिनों तक 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर के तापमान का सामना कर रहे हैं। 2040 तक, यह स्थिति लगभग 90 प्रतिशत डेटा सेंटर के सामने आ सकती है। इससे इनकी कूलिंग (शीतलन) की ज़रूरतें और परिचालन लागत में काफी बढ़ोतरी हो जाएगी।
दिल्ली में वर्तमान में लगभग 180 दिनों की तुलना में अगले 25 वर्षों में गर्म रातों (20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर न्यूनतम तापमान) की संख्या 210 दिनों से अधिक होने का अनुमान है।
'क्रेविस' के अनुसार, कई जिलों में प्रतिवर्ष भारी बारिश वाले 10 से 30 दिनों की वृद्धि देखी जा सकती है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे मध्य और दक्षिणी राज्यों में बारिश और गर्मदिनों, दोनों में ही अधिक वृद्धि होने की संभावना है।
सीईईडब्ल्यू के ये निष्कर्ष ऐसे समय में आये हैं, जब भारत शुरुआती लू (हीटवेव) से लेकर संभावित 'सुपर अल नीनो' जैसी जलवायु की चरम स्थितियों का सामना कर रहा है। भारत पहले से ही गर्मी के बढ़ते जोखिम को देख रहा है, जहां 57 प्रतिशत से अधिक जिले और लगभग 75 प्रतिशत आबादी के सामने अधिक से बहुत अधिक गर्मी का जोखिम मौजूद है।
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