पटना , अप्रैल 21 -- लवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच बिहार ने कृषि क्षेत्र में बड़ा कदम उठाते हुए जलवायु अनुकूल खेती को व्यापक स्तर पर लागू किया है। वर्ष 2019-20 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू की गई यह पहल अब राज्य के सभी 38 जिलों तक पहुंच चुकी है और लगातार विस्तार कर रही है।राज्य के 190 गांव पूरी तरह जलवायु अनुकूल खेती को अपनाकर उदाहरण पेश कर रहे हैं। इन गांवों में कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिकों की देखरेख में 20 प्रकार के फसल चक्र का सफल प्रदर्शन किया गया है। वर्ष 2019 से 2025 के बीच 2.63 लाख एकड़ भूमि पर खरीफ, रबी और गरमा फसलों की खेती इस तकनीक से की गई, जिससे करीब 2.78 लाख किसान सीधे लाभान्वित हुए हैं।

भूमि सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 12,807 एकड़ भूमि को लेजर लैंड लेवलर से समतल किया गया, जिससे सिंचाई में पानी की बचत के साथ उत्पादन लागत में कमी आई है।

जलवायु अनुकूल खेती के तहत 1,910 एकड़ में ज्वार, बाजरा, रागी, सांवा, कोदो, कुटकी, कंगनी, चीना और ब्राउनटॉप मिलेट जैसे नौ प्रकार के मोटे अनाज की खेती की जा रही है। इससे पोषण सुरक्षा के साथ-साथ किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है।

इसके अलावा वर्ष 2019 से 2025 तक 6.4 लाख किसानों को प्रशिक्षण एवं एक्सपोजर विजिट कराई गई, जिससे वे आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हुए।

नई तकनीकों से पराली प्रबंधन में सुधारआंकड़ों के अनुसार, 1,892 एकड़ में हैप्पी सीडर के माध्यम से गेहूं की बुआई की गई है। वहीं, स्ट्रॉ बैलर से 5,577 टन फसल अवशेष का प्रबंधन किया गया। करीब 10,978 एकड़ में वेस्ट डीकम्पोजर का उपयोग हुआ, जबकि 17,387 एकड़ क्षेत्र में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन प्रयासों से न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिला है, बल्कि कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण सफलता मिली है। बिहार का यह मॉडल अब अन्य राज्यों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहा है।

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