जयपुर , मई 18 -- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने धरती में दफन करीब पांच हजार साल पुरानी संस्कृति और इतिहास से रू-ब-रू कराने वाले पुरावशेष साक्ष्यों को जयपुर में अनूठे संग्रहालय का स्वरूप देकर अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर नायाब तोहफा दिया है।

एएसआई जयपुर मण्डल के मानसरोवर पटेल मार्ग स्थित परिसर में पुरातत्व वीथिका एवं व्याख्या केन्द्र बनाया गया है। एसआई जयपुर वृत्त के तत्कालीन अधीक्षण पुरातत्वविद डाॅ. विनय कुमार गुप्ता के अनुसार उन्होंने गोवर्धन पर्वत-डीग-कामां 84 कोस ब्रज परिक्रमा यात्रा मार्ग पर स्थित बहज के ऊंचे टीले पर 23 मीटर गहराई तक उत्खनन से प्राप्त दुर्लभ पुरावशेषों को संग्रहालय में सुसज्जित करने की पहल की।

संग्रहालय में 12 शोकेस में लगभग 1400 पुरावस्तुए संग्रहित की गई हैं इनमें बहज में वर्ष 2024-2025 में उत्खनन से मिली पांच हजार से अधिक पुरासामग्री में से चयनित 700 पुरावस्तुएं तथा ब्यावर जिले के ओझियाना की खुदाई से मिले 250 पुरावशेषों में भारत में प्राचीनतम शीशा का साक्ष्य प्रमुख है जो शीशे के टुकड़े के रूप में है। सीकर जिले का बेवान गणेश्वर संस्कृति से जुड़ा पुरातात्विक स्थल है जो ताम्बे और लोहे के निर्माण का केन्द्र था। संग्रहालय में टोंक उनियारा मार्ग पर नगर फोर्ट स्थल से मिली 1200 साल पुरानी पार्श्वनाथ की प्रतिमा भी लगाई गई है। डीग संग्रहालय में करीब चार हजार पुरावस्तुओं को प्रदर्शित किया गया।

डाॅ. गुप्ता ने बताया कि नगर फोर्ट में कई किलोमीटर में फैले टीले ए.एस.आई. की देश में सबसे बड़ी पुरातात्विक साइट है जहां 1920 में खुदाई के प्रयास किए गए थे। इसके पश्चात कोई उत्खनन नहीं हुआ।

जयपुर में 12 शोकेस में महाभारतकालीन साक्ष्य गुप्त काल, कुषाण, शुंग, मौर्य काल तथा मौर्य पूर्व संस्कृति से जुड़ी पुरावस्तुओं एवं पुरातात्विक स्थलों तथा इतिहास से अवगत कराने के लिए टच स्क्रीन कियोस्क लगाए गए हैं। मूक बधिरों की सुविधा के लिए साइन लैंग्वेज की व्यवस्था की गई है। तीस से चालीस दर्शक एल.ई.डी. पर जयपुर मंडल क्षेत्र के स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों रणथम्भौर दुर्ग, भानगढ़, नीलकंठ महादेव, आभानेरी जल संरचना, बयाना दुर्ग आदि से रूबरू हो सकेंगे।

इन पुरावस्तुओं में बहज में मिली बिना पकी मिट्टी की चार मुहरों पर तीन ब्राह्मी अक्षर अंकित हैं। इन्हें 600 ईसा पूर्व का माना जा सकता है। यह उपमहाद्वीप में ब्राह्मी लिपि के पुराने ज्ञात उदाहरण हैं। कुषाण कालखंड की जैस्पर पत्थर से बनी दुर्लभ आरम्भिक मौर्यकालीन मुहर पर अंकित प्रतीकों का सनातन धर्म में महत्व है। बहज से शिव पार्वती टेराकोटा मूर्ति सहित मिट्टी के बर्तन पर उकेरे गए त्रिशूल के साथ एक डमरू बंधा हुआ है जो महत्वपूर्ण है जो शुरुआती दौर की मूर्तिकला एवं टेराकोटा कला में त्रिशूल का पहला उदाहरण माना जा सकता है। डमरू की उपस्थिति भी रोमांचक है, क्योंकि डमरू बहुत बाद तक शिव मूर्तियों में नहीं पाया जाता।

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