श्रीनगर , सितंबर 09 -- जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील में आयोजित पहले जम्मू-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफजेके) के दौरान एक अनूठा प्रयोग देखने को मिल रहा है। झील के शांत जल पर एक तैरता हुआ थियेटर (फ्लोटिंग थियेटर) तैयार किया गया है, जहां दर्शक बड़ी स्क्रीन पर क्लासिक हिंदी फिल्मों का लुत्फ उठा रहे हैं।

एक ऐसे मनमोहक माहौल में जहां झील, पहाड़ और शहर की रोशनी एक साथ नजर आती हैं, दर्शकों ने बड़ी तैरती स्क्रीन पर फिल्मों का आनंद लिया। इस दौरान डल झील के किनारे खुले सभागार की भूमिका निभा रहे थे।

सात सितंबर से शुरू हुए इस चार दिवसीय महोत्सव का यह अनूठा प्रयास सबसे प्रमुख आकर्षणों में से एक बनकर उभरा है, जिसने सिनेमा के इस जश्न को कश्मीर की दृश्य और सिनेमाई विरासत से गहराई से जोड़ दिया है।

अधिकारियों ने बताया कि तैरते थियेटर की शुरुआत महोत्सव के पहले दिन 1961 की सदाबहार फिल्म 'जंगली' के प्रदर्शन के साथ हुई। इस स्क्रीनिंग ने दर्शकों को झील के किनारे आकर्षित किया, जहां डल झील की लहरों के बीच यह क्लासिक हिंदी फिल्म प्रदर्शित हुई और एक यादगार दृश्य पेश किया। जैसे ही डल झील के पानी पर स्क्रीन जगमगाती है, परिवार, पर्यटक, देश-विदेश से आये सिनेमा प्रेमी और उत्सुक लोग किनारों पर जुटने लगते हैं, जिससे यह स्क्रीनिंग एक जीवंत सार्वजनिक अनुभव बन जाती है।

यह अनुभव सिनेमा देखने की पारंपरिक धारणा से परे है, जहां दर्शक उन प्राकृतिक नजारों के बीच बैठकर फिल्में देख पा रहे हैं, जिन्होंने पीढ़ियों से फिल्म निर्माताओं को प्रेरित किया है। यह पहल सिनेमा को पारंपरिक थियेटरों से बाहर निकालकर सार्वजनिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों तक पहुंचाने के आईएफएफजीके के प्रयासों को भी दर्शाती है।

बुधवार को तैरते थियेटर में सदाबहार फिल्म 'कश्मीर की कली' का प्रदर्शन किया गया, जिसने शम्मी कपूर की अद्भुत ऊर्जा एवं करिश्मे और शर्मिला टैगोर के सहज आकर्षण तथा सुंदरता से डल झील की लहरों को सराबोर कर दिया।

अपने रोमांस, संगीत और जीवंत अभिनय के लिए याद की जाने वाली इस फिल्म ने दर्शकों को एक ऐसे माहौल में हिंदी सिनेमा की इस बेहद पसंदीदा क्लासिक फिल्म को दोबारा जीने का अवसर दिया, जो इसकी कहानी से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।

10 सितंबर को महोत्सव के समापन अवसर पर यह पुरानी यादों का सिलसिला जारी रहेगा, जब यश चोपड़ा की फिल्म 'कभी-कभी' (1976) की स्क्रीनिंग की जायेगी। यह फिल्म भी कश्मीर की सिनेमाई परंपरा से जुड़ी एक और मशहूर क्लासिक रचना है।

झील के पानी पर प्रक्षेपित होती फिल्मों और किनारे पर जुटे दर्शकों के साथ डल झील अब सिर्फ इस महोत्सव की पृष्ठभूमि भर नहीं रह गयी है, बल्कि यह खुद इस सिनेमाई अनुभव का एक हिस्सा बन चुकी है।

यह तैरता थियेटर कश्मीर के तीन अटूट तत्वों- यहां की खूबसूरत वादियों, हिंदी सिनेमा से इसके जुड़ाव और किस्सागोई के इसके प्रेम को एक साथ लाता है। यह एक ऐसा अनूठा अनुभव प्रदान करता है, जो प्रदर्शित हो रही फिल्मों के साथ-साथ इस जगह की खूबसूरती को भी पूरी तरह समेटे हुए है।

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