श्रीनगर , सितंबर 23 -- जम्मू-कश्मीर के सरकारी कॉलेजों और सार्वजनिक पुस्तकालयों से हजारों किताबों को हटाए जाने के मामले पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि वर्तमान केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था में उनकी सरकार के पास ऐसे फैसले लेने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि किताबों पर प्रतिबंध को लेकर उनके अपने विचार हैं, लेकिन अधिकार सीमित होने के कारण उन्हें स्थितियां बदलने का इंतजार करना होगा।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब जम्मू-कश्मीर सरकार ने विधानसभा में जानकारी दी कि केंद्र शासित प्रदेश के सरकारी डिग्री कॉलेजों में मौजूद 21.81 लाख से अधिक पुस्तकों और प्रकाशनों के व्यापक ऑडिट के बाद कुल 4,767 किताबें हटाई गई हैं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, हटाई गई किताबों में 4,249 गैर-प्रतिबंधित आपत्तिजनक पुस्तकें (3,996 कश्मीर संभाग से और 253 जम्मू संभाग से) और 518 पहले से प्रतिबंधित पुस्तकें शामिल हैं। इसके अतिरिक्त 1,752 अन्य किताबों को विशेषज्ञ समिति के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजा गया है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम संवैधानिक मूल्यों और देश की संप्रभुता व अखंडता की रक्षा के लिए उठाया गया है।

दूसरी ओर, हुर्रियत चेयरमैन और कश्मीर के मुख्य मौलवी मीरवाइज उमर फारूक ने इस कार्रवाई को शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए सरकार से पूर्ण पारदर्शिता की मांग की है। मीरवाइज ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में किताबों को किस आधार पर आपत्तिजनक माना गया, उन सभी पुस्तकों के नाम और उन्हें हटाने के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों के पढ़ने पर वैचारिक नियंत्रण लगाने से आलोचनात्मक सोच और ज्ञान का विकास बाधित होता है।

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