जमुई, जनवरी 24 -- बिहार के जमुई जिले में बरहट प्रखंड का चोरमारा गांव कभी नक्सल आतंक से दहशत के साये में जी रहा था, लेकिन बदले हुए हालात में आज वहां शांति है और लोग भरोसे और उम्मीद के साथ जीवन बसर करने लगे हैं।
एक दौर था जब इस इलाके में बच्चों को पढ़ाई नसीब नहीं थी, स्कूल उड़ाए जाते थे और गांव के लोग डर के साये में जीने को मजबूर थे, लेकिन आज वहां बच्चे स्कूल जा रहे हैं, मतदान हो रहा है और सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंच रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) कैंप नहीं होता तो हालात आज भी बदतर होते। कैंप बनने के बाद न केवल नक्सलियों की गतिविधियां खत्म हुईं, बल्कि गांव के लोगों में सुरक्षा और विश्वास की भावना भी मजबूत हुई है। नक्सलियों का गढ़, अब शांति का प्रतीक बन गया है।
चोरमारा गांव के रामविलास कोड़ा बताते हैं कि चारों तरफ पहाड़ और जंगल होने के कारण यह इलाका कभी नक्सलियों का सुरक्षित बसेरा था। यहीं उनका ट्रेनिंग सेंटर चलता था। गांव के युवकों को जबरन संगठन में शामिल किया जाता था और विरोध करने पर उन्हें सरेआम पीटा जाता था, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब गांव में शांति है और बाशिंदे डर के बिना जी रहे हैं।
इसी गांव के रहने वाले नागेश्वर कोड़ा बताते हैं कि नक्सलियों की सक्रियता के दौर में बच्चों की पढ़ाई ठप्प थी और स्कूल के भवन उड़ा दिए जाते थे। अब गांव में प्राथमिक स्कूल है, बच्चे नियमित पढ़ाई कर रहे हैं और मध्यान्ह भोजन भी मिल रहा है।
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