पुणे , जुलाई 17 -- महाराष्ट्र भाजपा मजदूर सेल की अध्यक्ष ज्योति सावरदेकर ने जनता को केंद्र में रखकर बनायी जाने वाली श्रम नीति की मांग करते हुए कहा है कि भारत के विकास को केवल आर्थिक विकास से नहीं आंका जाना चाहिए, बल्कि देश की प्रगति की रीढ़ बनने वाले प्रवासी मजदूरों की गरिमा, कल्याण और भलाई से भी मापा जाना चाहिए।
सुश्री सावरदेकर ने एक बयान में कहा कि भारत अपनी ऊंची इमारतों, राजमार्गों, मेट्रो नेटवर्क और बढ़ते उद्योगों पर गर्व करता है। प्रवासी मजदूरों के योगदान और उनके त्याग को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के लाखों मजदूर हर साल रोजगार की तलाश में अपना घर छोड़ते हैं। उनके ऊपर उम्मीदों औऱ परिवारों को पालने का बोझ भी होता है।
उन्होंने कहा कि पलायन केवल काम की जगह बदलना नहीं होता, यह जिंदगी का पूरी तरह बदल जाना है। पिता अपने बच्चों से सालों दूर बिताते हैं, माताएं अकेले परिवार पालने की जिम्मेदारी उठाती हैं, बुजुर्ग माता-पिता अपने बेटा-बेटी के सहारे के बिना रहते हैं और कई बच्चे अपने माता-पिता को केवल मोबाइल स्क्रीन के जरिए पहचानते हुए बड़े होते हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या देश सकल घरेलू उत्पाद, निवेश, निर्यात और औद्योगिक उत्पादन जैसे आर्थिक आंकड़ों का जश्न मनाते समय टूटे हुए परिवारों, खोए हुए बचपन और बढ़ते मानसिक तनाव की कीमत का हिसाब रखता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत के विकास के अगले चरण में लोगों के घरों के पास रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जिला और तालुका स्तर पर उद्योगों को मजबूत करने, कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार करने और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने से मजबूरी में होने वाला पलायन कम होगा और परिवारों को साथ रहने में मदद मिलेगी। उन्होंने श्रमिकों के लिए व्यापक कल्याणकारी उपायों की भी मांग की, जिसमें उचित मजदूरी, सुरक्षित आवास, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बच्चों के लिए शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास के अवसर और मानसिक स्वास्थ्य सहायता शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को एक ऐसी श्रम नीति की आवश्यकता है जो श्रमिकों को केवल उत्पादन से जोड़कर न देखे, बल्कि राष्ट्र निर्माण में बराबर का भागीदार माने। उन्होंने कहा कि वास्तव में विकसित भारत की पहचान न केवल आधुनिक बुनियादी ढांचे से होगी, बल्कि उसके श्रमिकों के जीवन में दिखने वाली गरिमा, सुरक्षा और आत्म-सम्मान से होगी।
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