भोपाल , सितंबर 04 -- मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय द्वारा प्रदेश के जनजातीय चित्रकारों को चित्र प्रदर्शनी एवं चित्रों की बिक्री के लिए मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रतिमाह 'लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा' में किसी एक जनजातीय चित्रकार की प्रदर्शनी सह-विक्रय का आयोजन 'शलाका' के नाम से किया जाता है।

इसी क्रम में तीन सितंबर से भील जनजातीय चित्रकार बाबू ताहेड़ के चित्रों की प्रदर्शनी सह-विक्रय शुरू की गई है। 77वीं शलाका चित्र प्रदर्शनी 30 सितंबर तक मंगलवार से रविवार निरंतर दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

28 वर्षीय युवा भीली चित्रकार बाबू ताहेड़ का जन्म भोपाल में हुआ। उनके माता-पिता मंगलिया एवं अंतुबाई मूल रूप से झाबुआ जिले के पहाड़ी ग्राम गेहलर के रहने वाले हैं। रोजगार की तलाश में वर्षों पूर्व भोपाल आने के बाद वे यहीं बस गए। बाबू ताहेड़ छह भाई-बहनों में से एक हैं और उनकी शिक्षा-दीक्षा भोपाल में ही हुई। उन्होंने वाणिज्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। विशेष पर्व-त्योहार एवं मांगलिक अवसरों पर ही उनका पैतृक गांव जाना होता है, जिससे उनका अपनी जड़ों से जुड़ाव बना हुआ है।

विवाहित बाबू ताहेड़ के दो बच्चे हैं। उनकी पत्नी संगीता ताहेड़ भी पारंपरिक चित्रकला करती हैं और चित्रकर्म में उनका सहयोग करती हैं। वरिष्ठ भीली चित्रकार लाड़ोबाई, जो रिश्ते में उनकी ताई लगती हैं, के सान्निध्य में उन्होंने भीली चित्रकला सीखी तथा कुछ वर्षों तक उनके सहायक के रूप में कार्य किया।

वर्तमान में बाबू ताहेड़ स्वतंत्र रूप से चित्रकला करते हैं। उन्होंने दिल्ली, गोवा और बेंगलुरु सहित देश-प्रदेश की विभिन्न कलादीर्घाओं में आयोजित कई संयुक्त चित्रकला प्रदर्शनियों में भाग लिया है। उनके चित्रों में जंगली पशु-पक्षियों के साथ जनजातीय परंपराओं का विशेष रूप से चित्रण देखने को मिलता है। वह अपनी कला की सफलता का श्रेय अपनी कला गुरु एवं ताई लाड़ोबाई को देते हैं, जिनके निरंतर मार्गदर्शन और प्रेरणा से उनके चित्रकर्म को बेहतर स्वरूप मिला है।

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