सुकमा , अप्रैल 23 -- छत्तीसगढ़ में बस्तर संभाग के जगरगुंडा में कभी ऐसा समय था जब शाम का मतलब सिर्फ अंधेरा नहीं, बल्कि खामोशी और डर भी होता था। सूरज ढलते ही गांव जैसे खुद को समेट लेता था कंटीले तारों से घिरी बस्तियां, भारी गेट और भीतर कैद जिंदगी। छह बजते ही दरवाजे बंद, रास्ते सूने और हर घर के भीतर एक अनकहा खौफ।
लेकिन अब वही जगरगुंडा धीरे-धीरे उस दौर से बाहर निकलकर एक नई कहानी लिख रहा है जहां रात अब सन्नाटे की नहीं, हलचल की पहचान बन रही है। बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा की सीमाओं के बीच बसा यह इलाका कभी पहुंच से दूर और हालात से घिरा हुआ था। आज तस्वीर बदल रही है। कच्चे, जोखिम भरे रास्तों की जगह पक्की सड़कों ने ले ली है। दोरनापाल से जगरगुंडा तक बन रही सड़क इस बदलाव की सबसे बड़ी कड़ी बनकर उभरी है। अब सफर आसान हुआ है, तो बाजारों में रौनक भी लौटने लगी है। छोटे दुकानदार हों या ग्रामीण, सभी के लिए यह कनेक्टिविटी किसी नई शुरुआत से कम नहीं।
इस बदलाव की असली जमीन सुरक्षा के उस भरोसे ने तैयार की है, जो लंबे समय तक यहां गायब था। कभी नक्सलियों के मजबूत गढ़ के रूप में पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने हालात को काफी हद तक नियंत्रित किया है। लगातार ऑपरेशन और निगरानी के चलते गांवों में वह आत्मविश्वास लौटा है, जो वर्षों से दबा हुआ था। अब लोग रात में भी घरों से बाहर निकलते हैं, बातचीत करते हैं, दुकानें देर तक खुली रहती हैं-यह सब कुछ यहां के लिए कभी असंभव जैसा था।
जगरगुंडा की कहानी सिर्फ आज की नहीं है, इसके पीछे एक लंबा और पीड़ादायक इतिहास भी जुड़ा है। सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान यहां के हजारों लोग अपने ही गांव छोड़ने को मजबूर हुए थे। सुरक्षा के नाम पर बस्तियों को घेर दिया गया, जिससे सामाजिक जीवन बिखर गया। लेकिन अब उसी जमीन पर विकास की कोशिशें दिखाई दे रही हैं।
सरकार जगरगुंडा को शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। लंबे समय तक शिक्षा से दूर रहे बच्चों के लिए अब नए अवसर बन रहे हैं। इसी के साथ आर्थिक गतिविधियों में भी हलचल शुरू हुई है। करीब दो दशक बाद यहां बैंकिंग सेवा की वापसी एक बड़ा संकेत है। जनवरी 2026 में इंडियन ओवरसीज बैंक की शाखा खुलने से लोगों को अपने ही इलाके में वित्तीय सुविधाएं मिलने लगी हैं। पहले जहां छोटी-सी रकम निकालने के लिए भी 60-70 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था, वहीं अब गांव के भीतर ही बैंकिंग की सुविधा उपलब्ध है।
पुराने लोग बताते हैं कि एक दौर में जगरगुंडा को ''एशिया की इमली मंडी'' के नाम से जाना जाता था। जंगलों से निकलने वाली इमली, महुआ और चिरौंजी यहां की पहचान थे। हालात सुधरने के साथ यह पारंपरिक अर्थव्यवस्था भी फिर से सांस लेने लगी है। बाजारों में फिर से हलचल दिख रही है, और ग्रामीणों के चेहरे पर एक नई उम्मीद नजर आती है। हालांकि तस्वीर पूरी तरह मुकम्मल अभी भी नहीं है। गांधी चौक से थाना मार्ग तक की अधूरी सड़क बरसात में अब भी परेशानी का कारण बनती है। मोबाइल नेटवर्क की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है लोग अब बेहतर कनेक्टिविटी की मांग कर रहे हैं ताकि नई पीढ़ी डिजिटल दुनिया से जुड़ सके।
जगरगुंडा ने कंटीले तारों की कैद से निकलकर खुली हवा में कदम जरूर रख दिया है, लेकिन असली आजादी तब पूरी होगी जब बुनियादी सुविधाओं की ये छोटी-छोटी खामियां भी खत्म हो जाएंगी। फिलहाल इतना तय है कि यह इलाका अब डर की पहचान नहीं, बदलाव की मिसाल बनता जा रहा है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित