बैतूल , अगस्त 31 -- मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ने जंगल मद में दर्ज शासकीय जमीनों के आवंटन और लंबे समय से काबिज आदिवासी एवं भूमिहीन ग्रामीणों की बेदखली को लेकर प्रशासन पर न्यायालयीन आदेशों और कानूनी प्रावधानों की अनदेखी का आरोप लगाया है। संगठन ने ग्राम कढ़ाई की जंगल मद की जमीन फर्नीचर क्लस्टर को आवंटित किए जाने पर आपत्ति जताते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अवमानना याचिका दायर करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है।

जयस के प्रदेश पदाधिकारी एवं अधिवक्ता महेश उइके ने सोमवार को आरोप लगाया कि एक ओर 40 से 50 वर्षों से शासकीय भूमि पर रहकर जीवनयापन कर रहे भूमिहीन ग्रामीणों को अतिक्रमणकारी बताकर हटाया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर इसी तरह की जमीनों को विकास और औद्योगिक गतिविधियों के लिए आवंटित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालय वर्ष 1996 से जंगल मद में दर्ज भूमि को वन भूमि के रूप में मानने संबंधी आदेश देता रहा है। ऐसी भूमि पर लंबे समय से काबिज पात्र लोगों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए संसद ने वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून बनाया। इसके बावजूद कढ़ाई गांव की जंगल मद की जमीन के आवंटन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

जयस के अनुसार, कढ़ाई गांव की 1916-17 की मिसल बंदोबस्त और वर्ष 1950 के अभिलेखों में छोटे झाड़ के जंगल मद में दर्ज खसरा क्रमांक 158/1 का रकबा 60.26 एकड़ था, जो बाद में नए खसरा क्रमांक 187 और 36.527 एकड़ रकबे के रूप में दर्ज हुआ। संगठन का आरोप है कि इसी भूमि को फर्नीचर क्लस्टर के लिए आवंटित किया गया। भूमि विकास के नाम पर अनुदान दिए जाने और जमीन का मूल्य 250 से 300 रुपये प्रति वर्गफुट तक निर्धारित किए जाने का भी दावा किया गया है।

उइके ने आरोप लगाया कि कढ़ाई की इसी भूमि पर वर्षों से काबिज अनुसूचित वर्ग के भूमिहीनों को अतिक्रमणकारी बताकर बेदखल किया गया, जबकि बाद में जमीन को विकास के लिए आवंटित कर दिया गया। उन्होंने ग्राम डूढा बोरगांव की जंगल मद की भूमि के मामले में भी इसी तरह की कार्रवाई का आरोप लगाया।

जयस ने मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 237(1) और 237(3) का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आरक्षित भूमि के आवंटन में कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी है। संगठन का आरोप है कि कढ़ाई और डूढा बोरगांव की जमीन के मामलों में इन प्रावधानों की अनदेखी की गई।

श्री उइके ने कहा कि कढ़ाई की छोटे झाड़ के जंगल मद की जमीन का आवंटन उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवमानना और भू-राजस्व संहिता की धारा 237 के उल्लंघन का मामला है। उन्होंने बताया कि शीर्ष न्यायालय विधिक सेवा प्राधिकरण ने कढ़ाई की भूमि से संबंधित दस्तावेज मांगे थे, जिन्हें जयस की ओर से उपलब्ध करा दिया गया है। संगठन अब संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करने की तैयारी कर रहा है।

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