राजनांदगांव , अक्टूबर 20 -- छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के छुईखदान में विजयादशमी पर रावण दहन की जगह तलवार से रावण का वध करने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। करीब 250 साल पुरानी इस रियासतकालीन परंपरा के तहत मिट्टी से निर्मित विशालकाय रावण का सिर तलवार से काटा जाता है। इस आयोजन में राजपरिवार की प्रमुख भूमिका रहती है।
छुईखदान में विजयादशमी के दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ राजपरिवार की शाही सवारी निकाली जाती है। इसमें राजपरिवार के सदस्यों के साथ पुरोहित, निशान लेकर चलने वाले ब्राह्मण और भजन मंडलियां शामिल होती हैं। शाही सवारी के दौरान मंत्रोच्चार और भजनों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
पारंपरिक मार्ग से होते हुए शाही काफिला रावणभाठा पहुंचता है। यहां विधि-विधान से भगवान राम की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद राजपरिवार के प्रतिनिधि द्वारा तलवार से मिट्टी के रावण का सिर धड़ से अलग करने की रस्म पूरी की जाती है।
इस परंपरा के लिए तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। स्थानीय कुम्हार मिट्टी से विशालकाय रावण की आकृति तैयार करते हैं। इससे स्थानीय कारीगरों की पारंपरिक कला और शिल्प को भी प्रोत्साहन मिलता है।
रावण वध के बाद मिट्टी को लेकर भी स्थानीय लोगों में विशेष मान्यता है। लोग इसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं तथा रावणभाठा से मिट्टी लेकर अपने घरों में सुरक्षित रखते हैं।
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