बिलासपुर , मई 06 -- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कर्मचारियों के सहायता राशि मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया कहा है कि किसी कर्मचारी की मौत के बाद उसके परिवार को मिलने वाला मुआवजा पुराने तय वेतन सीमा के आधार पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक (असल) वेतन के अनुसार तय किया जाना चाहिए।
दरअसल, मामला जगदलपुर के ट्रक चालक सत्येंद्र सिंह से जुड़ा है, जिनकी 15 दिसंबर 2017 को सड़क हादसे में मौत हो गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी, बच्चों और मां ने मुआवजे के लिए दावा किया था।
श्रम न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए चालक की मासिक आय 9,880 रुपये मानी और करीब 9.49 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया लेकिन बीमा कंपनी ने इस फैसले को चुनौती दी। कंपनी का कहना था कि केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार अधिकतम वेतन 8,000 रुपये ही माना जाना चाहिए।
न्यायालय में न्यायाधीश बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने बीमा कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम एक सामाजिक कल्याण से जुड़ा कानून है, इसलिए मुआवजा तय करते समय उस समय के वास्तविक वेतन और परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने कलेक्टर दर के आधार पर तय 9,880 रुपये की मासिक आय को सही और न्यायसंगत माना। हालांकि, उच्च न्यायालय ने श्रम न्यायालय के उस फैसले में बदलाव किया जिसमें ब्याज को शर्तों के साथ लागू किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे पर 12 प्रतिशत सालाना ब्याज दुर्घटना की तारीख (15 दिसंबर 2017) से ही मिलेगा, न कि 45 दिन बाद से।
अंत में न्यायालय ने बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और पीड़ित परिवार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि मुआवजे की पूरी राशि पर 15 दिसंबर 2017 से भुगतान होने तक 12 प्रतिशत ब्याज दिया जाये।
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