बैतूल , फरवरी 18 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिला में न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी सुश्री रश्मि खुराना ने चेक बाउंस से जुड़े दो मामलों में मंगलवार को महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए परिवादी को जीएसटी रिटर्न और बैलेंस शीट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित तिथि तक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए तो परिवादी के विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाया जा सकता है।
प्रकरण परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अंतर्गत दर्ज किया गया है। परिवादी रविंद्र यादव (कमल ट्रेडर्स) ने कृष्णवी इंडस्ट्रीज के पीयूष भावसार तथा अनूपश्री एम्पोरियम के तरुण भावसार के विरुद्ध चेक अनादरण की शिकायत दर्ज कराई थी। दोनों मामलों में कुल चेक राशि लगभग 10 लाख रुपये बताई गई है, जिसमें एक चेक 5 लाख 53 हजार रुपये तथा दूसरा 4 लाख 50 हजार रुपये का है।
परिवादी की ओर से अदालत में टैक्स इनवॉइस प्रस्तुत कर यह दावा किया गया कि संबंधित राशि माल सप्लाई के बदले देय थी। वहीं बचाव पक्ष के अधिवक्ता भारत सेन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 94 के तहत आवेदन प्रस्तुत कर इन इनवॉइस की सत्यता पर प्रश्न उठाए। उनका तर्क था कि वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 के अंतर्गत टैक्स इनवॉइस जारी करने के पश्चात संबंधित व्यापारी के लिए जीएसटीआर-1 और जीएसटीआर-3बी जैसे रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है, जिससे वास्तविक लेन-देन की पुष्टि हो सके।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि केवल टैक्स इनवॉइस प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि बिना वास्तविक माल सप्लाई के भी इनवॉइस जनरेट किए जा सकते हैं। यदि इनवॉइस के अनुरूप जीएसटी रिटर्न दाखिल नहीं किए गए हैं तो इनवॉइस की प्रामाणिकता संदिग्ध हो सकती है। जीएसटी कानून के तहत फर्जी इनवॉइस जारी करना दंडनीय अपराध है, जिसमें जुर्माने के साथ आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान है।
दोनों पक्षों के तर्क सुनने एवं जीएसटी कानून के प्रावधानों का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए परिवादी को वर्ष 2020 की बैलेंस शीट तथा संबंधित जीएसटी रिटर्न अदालत में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए 26 फरवरी 2026 की समय-सीमा निर्धारित की गई है। अदालत ने कहा है कि निर्धारित अवधि में दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने की स्थिति में प्रतिकूल अनुमान लगाया जाएगा।
यह आदेश चेक बाउंस मामलों में जीएसटी दस्तावेजों के महत्व को रेखांकित करता है। इससे स्पष्ट है कि अदालतें अब केवल इनवॉइस के आधार पर नहीं, बल्कि जीएसटी अनुपालन और वित्तीय अभिलेखों के आधार पर भी लेन-देन की वास्तविकता की जांच कर रही हैं। इसे व्यापारिक विवादों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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