बैतूल , अगस्त 08 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले का चूड़िया गांव अपनी अनूठी परंपराओं, सामाजिक एकता और सामूहिक निर्णयों के कारण अलग पहचान बना चुका है। करीब एक सदी से अधिक समय से गांव में दूध, दही और छाछ बेचने की परंपरा नहीं है।
ग्रामीण इन उत्पादों को बाजार में बेचने के बजाय जरूरतमंदों और मेहमानों को निशुल्क उपलब्ध कराते हैं। गांव में आम की फसल का भी व्यापार नहीं किया जाता। ग्रामीण इन परंपराओं को संत चिन्ध्या बाबा की सीख और आस्था से जोड़ते हैं।
बैतूल जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित चूड़िया गांव की आबादी लगभग 3,500 है और यहां साक्षरता दर करीब 80 प्रतिशत बताई जाती है। गांव की पहचान अब केवल अपनी परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता के लिए भी इसे उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। वर्ष 2022 में ग्रामीणों ने सरपंच, पंच और जनपद सदस्य का चुनाव निर्विरोध कराने का फैसला लिया था। इसके लिए गांव को शासन से सात लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि मिली। ग्रामीणों ने इस राशि का उपयोग मोरंड नदी पर घाट निर्माण में किया।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1912 के आसपास चूड़िया में संत चिन्ध्या बाबा का प्रवास था। वे गोसेवा और जनकल्याण के लिए जाने जाते थे। स्थानीय मान्यता के अनुसार उन्होंने ग्रामीणों को दूध में मिलावट कर व्यापार करने से बचने और दूध व उससे बने उत्पादों का उपयोग जरूरतमंदों की सेवा के लिए करने की सीख दी थी। इसके बाद गांव में दूध, दही और छाछ बेचने की परंपरा समाप्त हो गई।
आज भी गांव में किसी परिवार के पास जरूरत से अधिक दूध होता है तो उसे बेचने के बजाय जरूरतमंदों को दे दिया जाता है। बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए भी दूध, दही और छाछ उपलब्ध कराना गांव की सहज परंपरा का हिस्सा है। ग्रामीणों का कहना है कि समय बदला, बाजार बढ़ा और आसपास के क्षेत्रों में इन उत्पादों का कारोबार बढ़ा, लेकिन चूड़िया ने अपनी पुरानी परंपरा को बनाए रखा।
चूड़िया की एक और खास बात यह है कि यहां आम की फसल भी बाजार में बेचने की परंपरा नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार संत चिन्ध्या बाबा ने गांव में बड़ी संख्या में आम और जामुन के पेड़ लगवाए थे। आज भी पेड़ों और फलों को सामुदायिक भावना से जोड़कर देखा जाता है। आम की फसल का उपयोग ग्रामीण स्वयं करते हैं और इसे व्यापार का माध्यम नहीं बनाया जाता।
गांव के उपसरपंच अभिमन्यु यादव के अनुसार करीब एक सदी पहले चूड़िया में हैजा जैसी गंभीर बीमारी का प्रकोप हुआ था। ग्रामीणों की मान्यता है कि उस समय संत चिन्ध्या बाबा ने काली मंदिर, गुरु साहब मंदिर और हनुमान मंदिर की स्थापना कराई थी। इसके बाद बीमारी का प्रकोप कम होने की बात ग्रामीण बताते हैं। बाद में संत ने गांव में जीवित समाधि ली। संत की स्मृति में आज भी हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले बैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर दो दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें चूड़िया सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मेला गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
चूड़िया में गोधना डेम की नहर और मोरंड नदी से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है। सिंचाई की सुविधा के कारण यहां गन्ना प्रमुख फसल है। ग्रामीण खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं। दूध का उत्पादन होने के बावजूद उसे बाजार में नहीं बेचने की परंपरा गांव को आसपास के क्षेत्रों से अलग बनाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि निर्विरोध पंचायत और वर्षों पुरानी सामाजिक परंपराओं ने गांव में आपसी सहयोग और एकता को मजबूत किया है। चूड़िया की कहानी बताती है कि आधुनिक दौर में भी कोई गांव अपनी विरासत, सामूहिक निर्णय और सामाजिक मूल्यों को कायम रखते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ सकता है। इसी वजह से दूध-दही नहीं बेचने और निर्विरोध पंचायत के लिए चूड़िया अब बैतूल ही नहीं, बल्कि प्रदेश में भी चर्चा का विषय बन रहा है।
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