सिलीगुड़ी , अक्टूबर 19 -- उत्तर बंगाल में डुआर्स के घने जंगलों के बीच, जहां हाथी सुरक्षित गलियारों में घूमते हैं और वनवासी पीढ़ियों से प्रकृति की गोद में जीवन बिताते आ रहे हैं, दुर्गा पूजा का सामुदायिक जीवन में एक खास स्थान है। चिलापाता वन क्षेत्र में यह सालाना उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जो वन अधिकारियों, चाय बागानों के मजदूरों और आसपास के ग्रामीण समुदायों को एक सूत्र में जोड़ती है।चिलापाता रेंज की यह दुर्गा पूजा वर्ष 1984 से निरंतर आयोजित की जा रही है। दशकों से यह इस वन क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना का एक अहम हिस्सा बन चुकी है, जो वन विभाग और अभयारण्य के समीपवर्ती निवासियों के बीच आत्मीय संबंधों को दर्शाती है।
जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान के प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) प्रवीण कस्वां ने बताया, "चिलापाता रेंज की यह पूजा 1984 से चली आ रही है। आसपास के वनीय गांवों के निवासी और चाय बागानकर्मी इस उत्सव में बड़े उत्साह के साथ भाग लेते हैं।"उन्होंने कहा, "हम इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। हमने शनिवार की शाम को पूजा का शुभारंभ किया।"यह परंपरा डुआर्स के वनीय अंचलों में सामुदायिक पूजा के समृद्ध इतिहास का एक भाग है। समीपवर्ती नीलपारा रेंज में दुर्गा पूजा की और भी प्राचीन परंपरा है, जिसकी शुरुआत 1930 के दशक में हुई थी।
श्री कस्वां ने कहा, "नीलपारा रेंज की दुर्गा पूजा इस जिले के सबसे पुराने आयोजनों में से एक है। इसकी शुरुआत 1930 के दशक में तत्कालीन रेंज अधिकारी ने कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों के लिए की थी, क्योंकि इस दूरस्थ क्षेत्र में अन्य कोई सार्वजनिक स्थल उपलब्ध नहीं था। वर्ष 1951 तक यह एक क्लब का रूप ले चुका था, जिसमें चाय बागान श्रमिकों सहित आसपास के क्षेत्रों के लोग भी शामिल होने लगे।"उन्होंने बताया कि इस परंपरा को हर वर्ष पूर्ण ऊर्जा के साथ निभाया जाता रहा है, जिससे इसकी विरासत आज भी जीवंत है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि नीलपारा पूजा की शुरुआत 17 अक्टूबर को हुई थी।
ये आयोजन दूर-दराज के इलाकों में वन प्रशासन की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में भी बताता है, जहां बस्तियां वनों के वृहद विस्तार से पृथक हुआ करती थीं। समय के साथ, इन वार्षिक उत्सवों ने विभिन्न समुदायों के लोगों को उनके दैनिक श्रम और सामाजिक दूरियों से परे जाकर एक मंच पर ला खड़ा किया है।
उत्तर बंगाल के पारिस्थितिक और ऐतिहासिक परिदृश्य में चिलापाटा का अपना विशिष्ट महत्व है। अलीपुरद्वार जिले में अवस्थित यह जंगल जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान को बक्सा टाइगर रिजर्व से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण हाथी गलियारा निर्मित करता है। इसकी समृद्ध जैव विविधता में हाथी, गैंडा, तेंदुआ और गौर शामिल हैं। यह क्षेत्र मूल निवासी राभा समुदाय और नलराजर गढ़ के पुरातात्विक अवशेषों से भी जुड़ा है, जो एक प्राचीन दुर्ग है और सामान्यतः इस क्षेत्र के आरंभिक मध्ययुगीन इतिहास से संबद्ध है। इस वन का महत्व केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसके आसपास बसे गांव, चाय बागान, मूल निवासी समुदाय और ऐतिहासिक अवशेष मिलकर एक ऐसा सांस्कृतिक परिदृश्य रचते हैं, जो आगंतुकों को डुआर्स की गहरी अनुभूति कराता है।
इस विरासत का महत्व कूच राजवंश के प्रसिद्ध सैन्य कमांडर बीर चिलाराई को समर्पित एक संग्रहालय के निर्माण की योजनाओं में भी परिलक्षित होता है। इस प्रस्तावित संग्रहालय से इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को और अधिक संबल मिलने की अपेक्षा है।
इस बीच, क्षेत्र में वन्यजीव पर्यटन को नए सिरे से प्रोत्साहन दिया जा रहा है। जलदापारा राष्ट्रीय उद्यान में ऑनलाइन सफारी बुकिंग की सुविधा आरंभ कर दी गई है, जिससे पर्यटक यात्रा से एक माह पूर्व तक अपनी सफारी आरक्षित कर सकते हैं।
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