भुवनेश्वर , मार्च 28 -- विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के शरीर में ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) के बैक्टीरिया मौजूद हैं, हालांकि लक्षणों के अभाव के कारण अधिकतर लोग इससे अनजान हैं।

इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईएमएस) और एसयूएम अस्पताल में विश्व टीबी दिवस के अवसर पर शनिवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने यह जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि इस स्थिति को 'लेटेंट टीबी इन्फेक्शन' (एलटीबीआई) कहा जाता है। इसमें बैक्टीरिया शरीर में तो होते हैं, लेकिन सक्रिय नहीं होते।एलटीबीआई से प्रभावित व्यक्तियों में लक्षण दिखाई नहीं देते और वे तत्काल संक्रामक नहीं होते, लेकिन यदि निगरानी न की जाये तो यह संक्रमण सक्रिय हो सकता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि अब भी सामाजिक कलंक इस बीमारी से निपटने में बड़ी बाधा बना हुआ है। भेदभाव के डर से कई लोग चिकित्सा सहायता लेने में हिचकिचाते हैं, जिससे निदान और उपचार में देरी होती है।

पुरी के श्री जगन्नाथ मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) सुदर्शन पोथल ने खुलेपन और समय पर उपचार के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने उल्लेख किया कि जो मरीज बिना किसी हिचकिचाहट के आगे आते हैं, उनके ठीक होने की संभावना कहीं बेहतर होती है। उन्होंने टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य के करीब पहुंचने के लिए व्यापक जागरूकता की तत्काल आवश्यकता पर भी बल दिया।

आईएमएस और एसयूएम अस्पताल की डीन प्रोफेसर (डॉ.) संघमित्रा मिश्रा ने निकट भविष्य में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी मामलों के लिए एक समर्पित वार्ड स्थापित करने की योजना की घोषणा की। उन्होंने जागरूकता फैलाने और शुरुआती पहचान को प्रोत्साहित करने में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, आशा कार्यकर्ताओं और छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

प्रोफेसर मिश्रा ने 2036 तक टीबी खत्म करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के निर्धारित वैश्विक लक्ष्य के बारे में भी बात की। वर्ष 2026 के विश्व टीबी दिवस का विषय- 'हां! हम टीबी को खत्म कर सकते हैं : देशों के नेतृत्व में, लोगों की शक्ति से', का हवाला देते हुए उन्होंने इस बीमारी से निपटने के लिए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया।

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