संतकबीरनगर , जुलाई 21 -- उत्तर प्रदेश के संतकबीरनगर जिले में सात वर्षीय बालक अरुण उर्फ डग्गू की हत्या के करीब चार वर्ष पुराने बहुचर्चित मामले में अदालत ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है।
अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) चंद्र मोहन श्रीवास्तव की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूर्ण और अखंड श्रृंखला स्थापित करने में विफल रहा, जिससे यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो सके कि अपराध केवल अभियुक्तों ने ही किया था। अदालत ने जांच में गंभीर खामियां पाए जाने पर तत्कालीन विवेचक के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की भी संस्तुति की है।
अभियोजन के अनुसार, कोतवाली खलीलाबाद क्षेत्र के मटिहना गांव निवासी सात वर्षीय अरुण उर्फ डग्गू चार मार्च 2022 को घर से लापता हो गया था। उसकी मां प्रमिला देवी ने अगले दिन गुमशुदगी दर्ज कराई। छह मार्च को थाना महुली क्षेत्र के राजघाट पुल के पास कठिनइया नाला किनारे झाड़ियों से बालक का शव बरामद होने के बाद पुलिस ने हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराएं जोड़कर विवेचना शुरू की।
प्रमिला देवी ने आरोप लगाया था कि गांव निवासी रविचंद्र उर्फ मंटू उन पर शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डालता था और विरोध करने पर उनके बेटे को जान से मारने की धमकी दी थी। इसी रंजिश में उसने अपने साथी धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल के साथ मिलकर बालक की हत्या कर शव झाड़ियों में फेंक दिया। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 302 और 201 के तहत आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कुल नौ गवाह प्रस्तुत किए, जिनमें मृतक की मां, परिजन, पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक, पंचायतनामा अधिकारी, विवेचक तथा पुलिसकर्मी शामिल थे। वहीं बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। "आखिरी बार साथ देखे जाने" वाले गवाहों के बयान घटना के करीब 19 दिन बाद दर्ज किए गए, स्वतंत्र गवाहों को पेश नहीं किया गया और वैज्ञानिक साक्ष्य भी आरोपियों की संलिप्तता सिद्ध नहीं करते।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत 'लास्ट सीन थ्योरी', कथित मकसद, चूड़ियों की बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सके। न्यायालय ने यह भी पाया कि घटनास्थल से मिले वैज्ञानिक साक्ष्य अभियुक्तों को अपराध से जोड़ने में सफल नहीं रहे तथा गवाहों के बयानों में भी महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद थे।
उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में तभी दोषसिद्धि संभव है, जब सभी परिस्थितियां इस प्रकार एक-दूसरे से जुड़ी हों कि अभियुक्त के निर्दोष होने की कोई संभावना शेष न रहे। इस मामले में ऐसी श्रृंखला स्थापित नहीं हो सकी। इसी आधार पर अदालत ने रविचंद्र उर्फ मंटू और धनेश्वर उर्फ झिंगेलाल को सभी आरोपों से दोषमुक्त करते हुए उनकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
फैसले में अदालत ने तत्कालीन विवेचक निरीक्षक विजय नारायण प्रसाद की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि विवेचना के दौरान घटनास्थल से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों का स्वतंत्र साक्षियों की मौजूदगी में सत्यापन नहीं कराया गया और बरामदगी से संबंधित शिनाख्त की प्रक्रिया भी विधिसम्मत तरीके से पूरी नहीं की गई। अदालत के अनुसार विवेचक ने अपने कई महत्वपूर्ण वैधानिक दायित्वों का निर्वहन नहीं किया, जिससे जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित हुई। इसे घोर लापरवाही मानते हुए न्यायालय ने उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की है।
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