रायगढ़ , सितम्बर 15 -- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में आयोजित 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह के पहले दिन सोमवार को पद्मश्री अनुज शर्मा के छत्तीसगढ़ी लोकगीतों और पद्मश्री डॉ. उषा बारले की पंडवानी प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। भक्ति संगीत, लोकगीत, पंडवानी और पंथी नृत्य की प्रस्तुतियों से रामलीला मैदान छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति के रंग में रंग गया।
समारोह के शुभारंभ के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। कल देर रात अनुज शर्मा ने भक्तिमय और छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत की प्रस्तुति देकर समां बांध दिया। उन्होंने "अहो भजो मन गणपति गणराज, सुमति मन..." से प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद "मंगल भवन अमंगल हारी...", "राम सिया राम" और "मैंने तेरे भरोसे हनुमान" सहित कई भजनों की प्रस्तुति दी।
इसके बाद अनुज शर्मा ने छत्तीसगढ़ की माटी और लोकजीवन से जुड़े लोकप्रिय गीत प्रस्तुत किए। "छइयां भुइयां", "माते-माते रहिबे अलबेला मोर", "अहो दौना पान", "ससुराल गेंदा फूल", "भोली सुरतिया" और "मया होगे तोर संग" सहित अन्य गीतों पर दर्शक झूमते नजर आए। तालियों की गड़गड़ाहट से रामलीला मैदान गूंज उठा।
अनुज शर्मा ने चक्रधर समारोह में छत्तीसगढ़ी कलाकारों और लोककला को प्रमुखता से मंच देने के लिए राज्य सरकार और जिला प्रशासन का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि चक्रधर समारोह जैसे प्रतिष्ठित आयोजन प्रदेश की कला-संस्कृति को व्यापक पहचान देने के साथ स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का बड़ा मंच उपलब्ध कराते हैं।
समारोह में पद्मश्री डॉ. उषा बारले ने कपालिक शैली में पंडवानी की प्रस्तुति देकर महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को जीवंत किया। हाथ में तंबूरा लेकर उनके ओजस्वी और भावपूर्ण गायन ने दर्शकों को छत्तीसगढ़ की समृद्ध पंडवानी परंपरा से परिचित कराया। द्रौपदी चीरहरण, कीचक वध और 'अमर कथा' सहित विभिन्न प्रसंगों की प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा।
इस दौरान डॉ. बारले की दोनों पुत्रियों ने छत्तीसगढ़ महतारी की आरती का गायन किया। इसके बाद बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर आधारित गीतों के साथ पंथी नृत्य की प्रस्तुति ने रामलीला मैदान को छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के रंग में सराबोर कर दिया।
डॉ. बारले ने सात वर्ष की उम्र में स्वर्गीय मेहत्तर दास बघेल से पंडवानी गायकी की शिक्षा शुरू की थी और बाद में पद्मविभूषण तीजन बाई से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों में भी पंडवानी की प्रस्तुतियां देकर छत्तीसगढ़ की इस लोकविधा को पहचान दिलाई है। पंडवानी के अलावा वे पंथी गीत, सतनाम भजन और चौका आरती जैसी लोक विधाओं में भी पारंगत हैं। लोककला के क्षेत्र में योगदान के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।
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