रायगढ़ , सितंबर 16 -- छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में आयोजित चक्रधर समारोह की दूसरी संध्या पर मंगलवार देर रात राजस्थानी लोक संस्कृति, शास्त्रीय वादन और प्रदेश की प्रसिद्ध पंडवानी कला के नाम रही। कालबेलिया, घूमर/झूमर और भवाई लोकनृत्य से लेकर तबला-सारंगी की जुगलबंदी तथा 'द्रौपदी चीरहरण' प्रसंग की पंडवानी प्रस्तुति ने दर्शकों को देर तक बांधे रखा।
समारोह की दूसरी संध्या का शुभारंभ राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने दीप प्रज्वलित कर किया और महाराजा चक्रधर सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित किए।
इसके बाद बाड़मेर से आए स्टार्क सोसाइटी के कलाकारों ने राजस्थान की लोक कला और संस्कृति को मंच पर उतारा। कलाकारों ने कालबेलिया, घूमर/झूमर सहित अन्य लोकनृत्यों की प्रस्तुति दी। कालबेलिया की लयबद्ध पदचाल और घूमती गतियों के साथ राजस्थान की पारंपरिक लोकधुनों ने दर्शकों का ध्यान खींचा।
'निबूड़ा', 'अली बोलो' और 'दमादम मस्त कलंदर' जैसे गीतों पर कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुत किया, जबकि भवाई लोकनृत्य को भी दर्शकों की सराहना मिली। प्रस्तुति के दौरान सभागार लगातार तालियों से गूंजता रहा।
दल में गायक आसिन खान, हारमोनियम पर लतीफ खान और साइये खां, ढोलक पर भुट्टा खान, खड़ताल पर देवू खान, सारंगी पर हुसैन खान और कामायचा पर ग्रुप लीडर दीन मोहम्मद ने संगत दी। नृत्य प्रस्तुतियों में हीरा, तनु, पूजा और प्रिया ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।
समारोह में शास्त्रीय वादन के दौरान निशित गंगानी ने तबले पर अपनी कला का प्रदर्शन किया, जबकि मुदस्सिर खान ने सारंगी पर उनका साथ दिया। तबले की थाप और सारंगी के सुरों के बीच सुर, ताल और लय के मेल को दर्शकों ने तालियों के साथ सराहा।
संध्या में छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी की प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र रही। रेलवे सुरक्षा बल, राजनांदगांव में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत तरुणा साहू ने महाभारत के मार्मिक प्रसंग 'द्रौपदी चीरहरण' को पंडवानी के माध्यम से प्रस्तुत किया। सुर, ताल और भाव के साथ दी गई प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
तरुणा साहू का पंडवानी से जुड़ाव साल 1994 से है। जवाहर नवोदय विद्यालय में अध्ययन के दौरान उन्हें पंडवानी की महान कलाकार पद्म विभूषण तीजन बाई के सान्निध्य में पंडवानी सीखने का अवसर मिला। गुरु तीजन बाई के साथ उन्होंने दिल्ली, भोपाल और उज्जैन के कालिदास समारोह सहित देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी।
उनकी कला-साधना के लिए साल 2005 में लोक और पारंपरिक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिली। साल 2024 में अयोध्या महोत्सव में पंडवानी प्रस्तुति के साथ उन्हें आइकॉनिक ऑनरेरी डॉक्टरेट अवॉर्ड और शक्ति सम्मान-2024 से भी सम्मानित किया गया।
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