मुंबई , सितंबर 17 -- टाटा ट्रस्ट्स के चेययमैन नोएल एन. टाटा ने श्री एन. चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने के टाटा संस के निदेशकमंडल के फैसले को "अवैध" बताया है।
टाटा ट्रस्ट्स ने गुरुवार को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि उन्होंने निदेशकमंडल की बैठक में भी श्री चंद्रशेखरन को तीसरे कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त करने के प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था।
विज्ञप्ति में कहा गया है, "चार निदेशकों के प्रस्ताव के पक्ष में और श्री नोएल टाटा के इसके खिलाफ वोट करने से टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के मद्देनजर वह वैधानिक रूप से अमान्य हो गया।"श्री चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त हो रहा है। इससे पहले 24 फरवरी 2026 की निदेशकमंडल की बैठक में श्री नोएल टाटा के विरोध के कारण उनका कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव खारिज हो गया था।
टाटा संस ने आज एक मीडिया बयान में कहा, "17 सितंबर 2026 को निदेशक की बैठक में चंद्रा (चंद्रशेखरन) ने अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के निदेशकमंडल के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बोर्ड ने बहुमत से प्रस्ताव पारित किया कि उनका मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर उन्हें अगले पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर फिर से नियुक्त किया जाए।"टाटा ट्रस्ट्स ने कहा है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के प्रावधानों के तहत चेयरमैन की नियुक्ति के लिए नामित निदेशक के बहुमत की जरूरत होती है। यह प्रक्रिया पहली बार नियुक्ति और पुनः नियुक्ति के लिए एक समान है। इसलिए, निदेशकमंडल चेयरमैन की नियुक्ति या पुनः नियुक्ति के बारे में तबतक कोई बैठक नहीं कर सकता या प्रस्ताव पारित नहीं कर सकता जबतक दोनों नामित निदेशक मौजूद न हों और न ही वैध रूप से इस संबंध में कोई प्रस्ताव पारित कर सकता है जबतक कि दोनों नामित निदेशक उसके पक्ष में वोट नहीं करते।
उसने कहा है कि चूंकि श्री नोएल टाटा ट्रस्ट के नामित निदेशकों में से एक हैं और उन्होंने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया है, यह अपने-आप वैधानिक तौर पर अमान्य और आधारहीन हो गया।
निदेशक मंडल की बैठक में श्री टाटा ने कहा कि पुनः नियुक्त किए जाने के लिए खुद को अनुपलब्ध करने का 12 अगस्त 2026 का फैसला श्री चंद्रशेखरन ने खुद ही लिया था। इसके बाद उन्होंने निदेशकमंडल के उस पत्र को खुद ही सार्वजनिक कर दिया। इसके बारे में उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स के साथ भी चर्चा नहीं की जिसकी इक्विटी हिस्सेदारी 66 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि इससे हुए नुकसान की भरपाई संभव नहीं है।
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