पेरिस , मई 29 -- फ्रांस की संसद के निचले सदन ने एक ऐतिहासिक फैसले में सर्वसम्मति से उस क्रूर कानून (कोड नोयर ) को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जो सदियों से फ्रांस के उपनिवेशों में दासों पर लागू था। लुई चौदहवें के जमाने (1685) के इस कानून के तहत गुलामों को इंसानों के बजाय 'चल संपत्ति' माना जाता था और उनके साथ मारपीट, शोषण, खरीद-बिक्री और हत्या तक की छूट मिली हुई थी।
फ्रांस ने करीब 170 साल पहले गुलामी प्रथा को खत्म कर दिया था और साल 2001 में इसे 'मानवता के खिलाफ अपराध' भी घोषित किया था। इसके बावजूद, गुलामों की कानूनी स्थिति तय करने वाले इन पुराने शाही कानूनों को कभी आधिकारिक तौर पर पूरी तरह निरस्त नहीं किया गया था। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने भी पिछले हफ्ते इस काले कानून को हटाने का पुरजोर समर्थन किया था। (नेशनल एसेंबली) निचले सदन की हरी झंडी के बाद अब यह विधेयक अंतिम मंजूरी के लिए सीनेट में जाएगा।
ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिटेन और पुर्तगालियों के बाद फ्रांसीसी लोग यूरोप में गुलामों के तीसरे सबसे बड़े व्यापारी थे। 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच फ्रांसीसी जहाजों के जरिए अफ्रीका से 10 लाख से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को जबरन ले जाकर कैरेबियाई देशों के बागानों में गुलामी की बेड़ियों में जकड़ दिया गया था। फ्रांस ने हालांकि 1794 की क्रांति के दौरान गुलामी खत्म की थी, लेकिन 1802 में नेपोलियन बोनापार्ट ने दोबारा सेना भेजकर इस प्रथा को बहाल कर दिया, जिसे आखिरकार 1848 में जाकर पूरी तरह समाप्त किया जा सका।
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब फ्रांस में गुलामों के वंशजों को मुआवजा देने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। मार्टिनिक द्वीप के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा है कि केवल प्रतीकात्मक कदम उठाना काफी नहीं है। गुलामी की वजह से जो ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए एक ठोस कानून और मुआवजा कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए। श्री मैक्रॉन ने भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू करने की बात कही है, हालांकि अभी तक किसी खास कदम की घोषणा नहीं हुई है।
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