दरभंगा , मई 08 -- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग के पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष सह मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. ए. के. बच्चन ने कहा कि गीतांजलि का मूल स्वर रहस्यवाद है, जो अनेक अन्य विचारों को जन्म देता है।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर पेंटिंग सह पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में वक्ताओं ने टैगोर की कालजयी कृति गीतांजलि के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष सह मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. ए. के. बच्चन ने कहा कि गीतांजलि का मूल स्वर रहस्यवाद है, जो अनेक अन्य विचारों को जन्म देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में रहस्यवाद वह उच्चतम अवस्था है, जहाँ मनुष्य की आत्मा ईश्वर से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करती है। रहस्यवादी मानता है कि इन्द्रियों से दिखाई देने वाला संसार अंतिम सत्य नहीं, बल्कि इसके पीछे एक और गहन एवं वास्तविक आध्यात्मिक संसार विद्यमान है, जिसे केवल आत्मानुभूति से समझा जा सकता है।उन्होंने कहा कि रहस्यवाद को तर्क से पूरी तरह व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। सभी रहस्यवादी बाहरी संसार से स्वयं को अलग कर अपने आंतरिक संसार से जुड़ने का प्रयास करते हैं। गीतांजलि इसी आध्यात्मिक अनुभूति की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है।

विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के विश्वविद्यालय समन्वयक डॉ. आर. एन. चौरसिया ने कहा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों को किसी एक श्रेणी में सीमित करना संभव नहीं है। गीतांजलि में दर्शन, अध्यात्म, मानवता और संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यह कृति न केवल टैगोर और बंगाली पुनर्जागरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि दर्शन में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य पठनीय ग्रंथ है।

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