पटना , अक्टूबर 15 -- िहार में पशु चिकित्सा और पशुपालन की कमान 'सुधा सखियों' को सौंपने की तैयारी चल रही है। दूध उत्पादन के क्षेत्र से सीधे तौर पर महिलाओं को जोड़ते हुए महिला सशक्तीकरण को नई दिशा देने के उद्देश्य से बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड (कॉम्फेड) ने 'सुधा सखी' की पहल की है। इस नवरात्रि में दुर्गा के नौ रूपों के अंतर्गत सुधा सखी भी एक सशक्त रूप में उभरकर सामने आ रही हैं। राज्य सरकार की सात निश्चय-3 के अंतर्गत शामिल सहकार से समृद्धि योजना के तहत गांव में डेयरी उत्पादक सहकारी समिति का गठन किया जा रहा है। इन सुधा सखियों का विस्तार राज्य की 8 हजार 53 पंचायतों तक पशुपालकों के लिए प्रथम संपर्क कड़ी के रूप में करने की योजना है। इसके पहले चरण में 38 जिलों से चयनित महिलाओं के लिए छह दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन इस वर्ष पटना स्थित कॉम्फेड के सभागार में 31 अगस्त से 5 सितंबर तक किया गया था। इस दौरान सुधा सखियों को पशुओं की प्राथमिक चिकित्सा, संतुलित पशु आहार, कृत्रिम गर्भाधान और वैज्ञानिक पशुपालन से जुड़ी आवश्यक सेवाओं का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद ये सखियां अपने-अपने गांव के स्तर पर पशुपालकों और पशु चिकित्सकों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम शुरू करने जा रही हैं। इससे प्राथमिक पशु स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुगम हो सकेगी तथा पशुपालकों को आवश्यक पशु स्वास्थ्य एवं पशुपालन संबंधित जानकारी उपलब्ध होगी। इसका सीधा असर दूध के उत्पादन पर होगा।

इस पहल से दो बड़े लाभ होंगे।एक तरफ ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भरता और स्थायी रोजगार का अवसर मिलेगा। दूसरी तरफ पशुपालकों को अपने गांव में ही विशेषज्ञ के मार्गदर्शन और सेवाएं मिल सकेगी। इससे दुग्ध क्षेत्र में महिला नेतृत्व और ग्रामीण सेवा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह स्पष्ट है कि सुधा सखी कोई नियमित या संविदा आधारित सरकारी या सहकारी कर्मचारी नहीं हैं। बल्कि, पंचायत स्तर पर सेवा आधारित एवं कमीशन या प्रोत्साहन राशि आधारित व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करने वाली स्थानीय महिला कार्यकर्ता हैं।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हाल में इसकी समीक्षा करते हुए पशुपालन एवं दुग्ध क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की घोषणा की थी। वर्तमान में करीब 12 लाख किसान दुग्ध उत्पादन से जुड़े हैं। इस संख्या को बढ़ाकर 50 लाख से अधिक करने का लक्ष्य है। महिलाओं को सुधा सखी, जीविका सुधा बिक्री केंद्र तथा दूध संग्रहण केंद्रों से जोड़कर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर डेयरी क्षेत्र में महिलाओं की करीब 70 प्रतिशत भागीदारी है। बिहार में इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा गया है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत सुधा बिक्री केंद्र खोलने वाली महिलाओं को दूसरी और तीसरी किश्त मिलाकर करीब 60 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। सभी पंचायतों में एक सुधा बिक्री केंद्र खोलने के लिए दीदी का चयन लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा। भविष्य में इसे गांवों तक विस्तार देने की योजना है। उन्होंने कहा कि पशु चिकित्सा एवं दवा की सुविधा को गांवों के करीब पहुंचाने के लिए राज्य के सभी 534 प्रखंडों में पशु औषधि बिक्री केंद्र खोलने का अभियान भी शुरू किया गया है।

कॉम्फेड और जीविका के संयुक्त प्रयास से करीब सात हजार जीविका दीदियों को डेयरी और पशुपालन का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। ये प्रशिक्षित पशु सखियां अब अपने-अपने गांवों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की महिला सदस्यों को प्रशिक्षण दे रही हैं। पशुपालन क्षेत्र के प्रथम चरण में पशु सखियों, आजीविका विशेषज्ञों और प्रत्येक प्रखंड के सीएलएफ नोडल को जिला स्तर पर प्रशिक्षित किया गया था, जिसके लिए कॉम्फेड और जीविका की ओर से जिला स्तरीय नोडल पदाधिकारी चयनित किए गए थे। पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य संसाधन विभाग के अनुसार, ये पशु सखियां केवल डेयरी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले समय में भेड़, बकरी, सूअर समेत अन्य लघु पशुओं का पालन करने वाली महिलाओं को भी अलग से प्रशिक्षण देगी।

चालू वित्तीय वर्ष में राज्य के प्रत्येक पंचायत के लिए एक-एक सुधा सखी का चयन करने का लक्ष्य रखा गया है। अगले वर्ष तक सभी 08 हजार 53 पंचायतों में सुधा सखियों का चयन पूर्ण कर लिया जाएगा।

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